बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

बिहारी के दोहे

बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe class 10

बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

मेरी भव- बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ ।
जा तन की झाईं परै, स्यामु हरित दुति होई ||

शब्दार्थ भव-बाधा-सांसारिक बाधाएँ, हरौ-दूर करो; नागरि-चतुर झाई-परछाई; परै-पड़ने पर; स्यामु – श्रीकृष्ण; हरित-दुति-दुःखों को हरना।

अर्थ कवि बिहारी राधिका जी की प्रशंसा करते हुए कहते हैं हे राधिके आप इस सांसारिक तरीके से मेरे विघ्नों को दूर करते हैं, अर्थात भक्तों के कष्टों को दूर करने में आप बहुत चतुर हैं, इसलिए मुझे इस दुनिया के कष्टों से मुक्त करें।

उनके शरीर की छाया से श्रीकृष्ण के शरीर का नीला रंग हरा हो जाता है अर्थात श्रीकृष्ण भी तृप्त हो जाते हैं, जिनका हृदय उनके शरीर की छाया से प्रकाशित होता है। सारे अज्ञान का अंधकार दूर हो गया है। ऐसी बुद्धिमान राधा मेरे सांसारिक विघ्नों को दूर करें

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काव्यगत सौन्दर्य भाषा ब्रज रस शृंगार एवं भक्ति अलंकार अनुप्रास ब्रज गुण माधुर्य, प्रसाद शैली मुक्तक छन्द दोहा
अनुप्रास अलंकार ‘हरौ, राधा नागरि’ में ‘र’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
श्लेष अलंकार ‘हरित दुति’ में कई अर्थों की पुष्टि हो रही है। इसलिए यहाँ श्लेष अलंकार है।

बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

मोर-मुकुट की चंद्रिकनु, यौं राजत नंदनंद ।।
मनु ससि सेखर की अकस, किय सेखर सत चंद ॥

शब्दार्थ चंद्रिकनु – चन्द्रमाओं से राजत-सुशोभित; मनु- मानो ससि सेखर–चन्द्रमा जिनके सिर पर है अर्थात् शंकर; अकस-प्रतिबिम्ब सत- सैकड़ों।

अर्थ श्री कृष्ण जी के मस्तक पर मोर का मुकुट सुशोभित है। उन मोरपंखों के बीच बने सुनहरे चन्द्रमा के आकार के चन्द्रमाओं को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने शंकर जी से तुलना करने के लिए अपने सिर पर सैकड़ों चन्द्रमा लगा रखे थे, अर्थात् श्रीकृष्ण के मस्तक पर मोर पंख का मुकुट सैकड़ों चन्द्रमाओं जैसा प्रतीत होता है और शंकर जी की छाया लगती है।

काव्यगत सौन्दर्य भाषा ब्रज माधुर्य शैली मुक्तक रस शृंगार छन्द अलंकार अनुप्रास अलंकार ‘मोर मुकुट’ और ‘ससि सेखर’ में क्रमश: ‘म’ और ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है। उत्प्रेक्षा अलंकार ‘मनु ससि सेखर की अकस’ अर्थात् मोर पंख के मुकुट की तुलना सैकड़ों चन्द्रमाओं से की गई है तथा यहाँ उपमान में उपमेय की सम्भावना व्यक्त की गई है। अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।

बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

सोहत ओदै पीतु पटु, स्याम सलौने गात।
मनौ नीलमनि सैल पर, आतपु परयौ प्रभात ।।

शब्दार्थ सोहत- सुशोभित होना; पीतु पतु – पीले वस्त्र; सलौने-सुन्दर; कैल-पर्वत आपतु – प्रकाश परयौ पड़ने पर प्रभात सुबह।
बिहारी जी कहते हैं कि श्रीकृष्ण के काले शरीर पर पीले रंग के वस्त्र ऐसे दिखाई दे रहे हैं मानो सूर्य की पीली किरणें प्रात:काल नीलम पर्वत पर पड़ रही हो, अर्थात श्रीकृष्ण ने अपने शरीर पर जो पीले वस्त्र धारण किए थे वे पीले रंग के लग रहे थे। नीलम पर्वत पर पड़ती सूर्य की किरणें। इसकी सुंदरता अवर्णनीय है।
काव्यगत सौन्दर्य गुण माधुर्य अलंकार अनुप्रास अलंकार ‘पीत पटु’, ‘स्याम सलौने’ और ‘परयौ प्रभात’ में क्रमश: ‘प’, ‘स’ और ‘प’ वर्ण की पुनरावृत्ति से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
उत्प्रेक्षा अलंकार ‘मनौ नीलमणि सैल पर’ यहाँ नीलमणि पत्थर की तुलना सूर्य की पीली धूप से की गई है, जिस कारण यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।

बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

अधर धरत हरि कै परत, ओठ – डीठि- पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्रधनुष – रँग होति ।।

शब्दार्थ अधर-नीचे का होंठ; धरत रखना; ओठ होंठ; डीटि-दृष्टि; पट-पीताम्बर; जोति – ज्योति होति होना।

अर्थ राधिका जी कहती है कि जब श्रीकृष्ण उसकी बांसुरी बजाते हैं अगर आप इसे अपने होठों  पर रखेंगे तो आपके होंठ, आंखें और पीतांबर इस पर लग जाएंगे। जैसे ही प्रकाश गिरता है, यह इंद्रधनुष की तरह कई रंगों में हरे बांस की बांसुरी की तरह हो जाता है। यानी यह बहुरंगी सुंदरता में बदल जाती है

काव्यगत सौन्दर्य अलंकार अनुप्रास अलंकार ‘अधर धरत हरि कै परत’ में ‘ध’, ‘र’, ‘त’, ‘ओट-डीटि’ में ‘ठ’, बाँस की बाँसुरी में ‘ब’ और ‘स’ वर्ण की आवृत्ति होने के कारण यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
उपमा अलंकार पद्यांश की दूसरी पंक्ति में बाँसुरी के रंगों की तुलना इन्द्रधनुष के रंगों से की गई है, जिस कारण यहाँ उपमा अलंकार है। यमक अलंकार ‘अधर धरत’ में ‘अधर’ शब्द के अनेक अर्थ हैं इसलिए यहाँ यमक अलंकार है।

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बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

अनुरागी चित्त की, गति समुझे नहि कोइ ।
ज्यौं-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यौं उज्जलु होई।।

शब्दार्थ अनुरागी-प्रेमी: चित- मनः गति – चाल; समुझे-समझना; चूड़े-डूबताहै; स्याम रंग-कृष्ण भक्ति का रंग; उज्जलु- प्रकाशित होना, पवित्र
काव्यगत सौन्दर्य भाषा प्रसाद ब्रज शैली मुक्तक गुण भक्ति छन्द दोहा

इस दोहे में श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबे रहने से मन और मस्तिष्क प्रबुद्ध हो जाते हैं। कवि ने इस पवित्र प्रेम को यहाँ चित्रित किया है। कवि कहता है कि श्रीकृष्ण से प्रेम करने वाली मेरे मन की स्थिति बड़ी विचित्र है। आपकी हालत कोई और नहीं समझ सकता। इस प्रकार श्रीकृष्ण का रंग भी गहरा होता है, लेकिन जैसे मेरा मन कृष्ण के प्रेम में लीन होकर काले रंग में लीन हो जाता है, वैसे ही वह ज्ञानी अर्थात् निर्मल हो जाता है

काव्यगत सौन्दर्य भाषा ब्रज रस शान्त अलंकार पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘ज्यौं-ज्यों’ और ‘त्यौं-त्यौं’ में एक ही
शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।

बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

लगु या मन-सदन मैं, हरि आवैं किहि बाट।
विकट जटे जौ लगु निपट, खुटै न कपट- कपाट।।

शब्दार्थ मन-सदन – मनरूपी घट; वाट- रास्ता देखना; विकट जटे-दृढ़ता से बन्द; जौ लगु – जब तक: निपट-अत्यन्त; सदा-सदा के लिए खुटै खुलेंगे कपट-कपाट-कपटरूपी किवाड़।

दोहे में बिहारी जी ने कहा कि जब तक मन के पाखंड को समाप्त नहीं किया जाता तब तक ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है।
कवि बिहारी जी कहते हैं कि जब तक दृढ़ निश्चय के साथ मन के कपटपूर्ण द्वार सदा के लिए नहीं खुल जाते, तब तक भगवान कृष्ण किस रूप से इस मन के रूप में आएं, अर्थात् कहने का अर्थ यह है कि यहां तक ​​कि ढोंग का भी मनुष्य का मन समाप्त नहीं होगा, अत: तब तक तुम श्रीकृष्ण मन में निवास नहीं करोगे।

काव्यगत सौन्दर्य अनुप्रास अलंकार ‘मन-सदन’, ‘जटे जौ’ और ‘कपट कपाट क्रमश: ‘न’, ‘ज’, ‘क’ और ‘प’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से अनुप्रास अलंकार है। रूपक अलंकार ‘कपट- कपाट’ अर्थात् कपटरूपी किवाड़ का किया गया है, जिस कारण यहाँ रूपक अलंकार है।

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जगतु जनायौ जिहि सकलु, सो हरि जान्यौ नहि।
ज्यौ आँखिनु सबु देखिये, आँखि न देखी जाँहि

शब्दार्थ जगतु – संसार, जनायौ- ज्ञान कराया जिहि जिसने सक्नु- सम्पूर्ण जान्यौ नहि जाना नहीं।
व्याख्या कवि बिहारी जी कहते हैं कि तू उस ईश्वर को जान ले, जिसने तुझे इस सम्पूर्ण संसार से अवगत कराया है। अभी तक तूने उस हरि  को नहीं जाना है यह बात ऐसी प्रतीत हो रही है, जैसे आँखों से हम राब कुछ देख लेते हैं, परन्तु आखें स्वयं अपने आप को नहीं देख पातीं।
काव्यगत सौन्दर्य भाषा बज शैली गुण रस शान्त छन्द अलंकार अनुप्रास अलंकार ‘जगतु जनायौ जिहिं’ और ‘सकलु सो’ में ‘ज’ और ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है

बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

जप माला छापा तिलक, सरै न एकौ कामु ।
मन-काँचै नाचै वृथा, साँचे राँचे रामु।।

शब्दार्थ जप- जपना; छापा तिलक टीका लगाना; सरै-सिद्ध होता है; एकौ कामु एक भी काम; मन-काँचै- कच्चे मनवाला; नाचे-भटकना; साँचे रौंचे राम-राम तो सच्ची भक्ति से अनुरक्त होते हैं।

प्रस्तुत दोहे में बिहारी जी ने भक्ति का घमण्ड करने वालों में सच्चे हृदय से कटाक्ष और स्नेह का महत्व बताया अर्थात् ईश्वर की सच्ची भक्ति पर बल दिया गया।
कवि बिहारी जी कहते हैं कि भक्ति के नाम पर दिन भर माला जपना और दिखावे के लिए माथे पर तिलक लगाना आदि से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता अर्थात् भक्ति के नाम पर, धार्मिक दिखावे से कोई लाभ नहीं, बल्कि सच्चे हृदय से होता है। उनकी भक्ति से ही राम चिपके रहेंगे और ईश्वर की प्राप्ति होगी। सच्ची भक्ति से ही भगवान प्रसन्न होते हैं

दुसह दुराज प्रजानु कौ ,क्यों न बढे दुख-दंदु।

अधिक अंधेरो जग करत, मिला मावस रवि चंदु।।

अर्थ दो राजाओं के शासित राज्य में उस राज्य की प्रजा के कष्ट दुगने क्यों नहीं होते, क्योंकि दोनों राजाओं के भिन्न-भिन्न मतों, उनके आदेशों, नियमों और नीतियों के बीच प्रजा दो पक्षों के बीच आटे की तरह कुचली जाती है। जिस प्रकार अमावस्या के दिन एक ही राशि में सूर्य और चंद्रमा एक साथ मिलकर संसार में अधिक अंधकार का कारण बनते हैं, उसी प्रकार एक ही राज्य पर दो राजाओं का शासन प्रजा के लिए दोहरे दुख का कारण बन जाता है।

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काव्यगत सौन्दर्य शैली मुक्तक छन्द दोहा अनुप्रास अलंकार ‘दुसह दुराज’, ‘अधिक अँधेरी’ और ‘मिलि मावस’ में क्रमश: ‘द’, ‘अ’, ‘ध’ और ‘म’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है। श्लेष अलंकार ‘दुसह’ और ‘दंदु’ में अनेक अर्थ व्याप्त हैं, इसलिए यहाँ श्लेष अलंकार है।
दृष्टान्त अलंकार ‘रवि चंदु’ में उपमेय और उपमान का बिम्ब- प्रतिविग्य भाव प्रकट हुआ है। इसलिए यहाँ दृष्टान्त अलंकार है।

बसै बुराई जासु तन, ताही कौ सनमानु।
भलौ-भलौ कहि छोड़िये, खोटै ग्रह जपु दानु ||

शब्दार्थ बसै- समाना; जासु – जिसके; सनमानु- सम्मान, आदर: खोटैं ग्रह-अनिष्ट ग्रह (शनि आदि) जपु – जाप; दानु – दान

कवि बिहारी जी कहते हैं कि जिस मनुष्य के शरीर में बुराई का वास होता है, उसी का सम्मान किया जाता है। संसार की यही नीति है कि जो व्यक्ति दुष्ट एवं बुरा है, जगत् में उसी का सम्मान किया जाता है, जब अच्छा समय होता है तो भला-भला कहकर छोड़ दिया जाता है। और जब बुरा समय आता है तो मनुष्य उसके लिए दान व जाप करने लगता है अर्थात् अच्छे समय में मनुष्य ईश्वर को भूल जाता है और बुरा समय आने पर वह ईश्वर की स्तुति करने लगता है।

काव्यगत सौन्दर्य अनुप्रास अलंकार ‘बसै बुराई’ में ‘ब’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार भली-भलौ’ में एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
श्लेष अलंकार ‘ग्रह’ में अनेक अर्थों का भाव प्रकट होने से यहाँ श्लेष अलंकार है। विरोधाभास अलंकार इस पद्यांश में दुष्ट व्यक्ति के प्रति विरोध न होने पर भी विरोध का आभास है, इसलिए यहाँ विरोधाभास अलेकार है।

नर की अरु नल-नीर की गति एकै करि जोई।
जेतौ नीचो ह्रै चलै, तेतौ ऊँचौ होई।

शब्दार्थ नर-मनुष्यः अरु- इच्छाएँ; नल-नीर-नल का पानी गति-चाल, इच: जेतौ – जितना; तेतौ उतना।

प्रस्तुत दोहे में मानवीय विनम्रता के महत्व का वर्णन किया गया है।  कवि बिहारी जी कहते हैं कि मनुष्य की स्थिति नल के पानी की तरह है। वे एक ही हैं। जैसे नल का पानी नीचे की ओर जाता है, इसमें पानी जितना ऊपर उठता है, यानी जल स्तर उतना ही अधिक होता है। विनम्रतापूर्वक यानी उसकी श्रेष्ठता यानी दुनिया में उसकी इज्जत उतनी ही बढ़ती जाती है।
दिन-ब-दिन यह बढ़ता ही जा रहा है।

काव्यगत सौन्दर्य भाषा ब्रज रस शान्त अलंकार अनुप्रास अलंकार शैली मुक्तक छन्द दोहा ‘नल-नीर’ में ‘न’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है। उपमा अलंकार ‘नल-नीर’ की उपमा मनुष्य से की गई है, इसलिए यहाँ उपमा अलंकार है। श्लेष अलंकार यहाँ ‘नीर’ शब्द के अनेक अर्थ हैं, इसलिए यहाँ श्लेष अलंकार है।

बिहारी के दोहे Bihari Ke Dohe

बढ़त-बढ़त संपति-सलिलु, मन-सरोजु बढ़ि जाइ। 
घटत-घटत सु न फिरि घटै, बरु समूल कुम्हिलाइ।।

शब्दार्थ संपति-सलिलु-सम्पत्तिरूपी जल; मन-सरोजु–मनरूपी कमल; फिर-फिर से; घंटे-घटता; बरु – भले ही; समूल जड़ सहित;

अर्थ  कवि बिहारी जी कहते हैं कि जब मनुष्य का सम्पत्तिसपी जल बढ़ता है, तो उसका मनरूपी कमल भी बढ़ जाता है अर्थात जैसे-जैसे मनुष्य के पास धन बढ़ने लगता है, वैसे से ही उसकी इच्छाएं भी बढ़ने लगती है, परन्तु जब सम्पत्तिरूपी जल घटने लगता है, तब मनुष्य का मनरूपी कमल नीचे नहीं आता, मते ही वह जह सहित नष्ट न हो जाए अर्थात् धन चले जाने पर भी उसकी इच्छारें कन नहीं होती; जैसे जल के बढ़ने पर कमल नाल बढ़ जाती है, लेकिन जल घटने पर यह नहीं
घटती
काव्यगत सौन्दर्य ब्रज भाषा शैली मुक्तक अनुप्रास अलंकार ‘संपति सलिलु’ और ‘समूल कुन्हिलाई’ में ‘स’ और ‘ल’ वर्ग को पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुमास अलंकार है। पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ‘बट-बढ़त’ और ‘घटट-चटल में एक शब्द की पुनरावृति होने से यहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। रूपक अलंकार ‘संपति-सलिल’ और ‘नम सरोज’ में उपनेव तथा उपमान में भेद नहीं है। इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।

जौ चाहत, चटकन घटे, मैलौ होइ न मित्त।
रज राजसु न छुवाइ तौ, नेह-चीकन चित्त ॥

शब्दार्थ चटक = प्रतिष्ठा, चमक। मैलो = दोष से युक्त। मित्त = मित्र। रज = धूल। राजसु = रजोगुण। नेह चीकन = प्रेम से चिकने, तेल से चिकने। चित्त = मन, मनरूपी दर्पण

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कवि बिहारी जी कहते हैं, हे मित्र यदि आप चाहते हैं कि आपके मन की चमक और चमक कभी समाप्त न हो, तो प्रेम के कुएं से निर्मल मन को क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, घृणा आदि की धूल से स्पर्श होने दें। जिस प्रकार कुएं से सुसज्जित वस्तु में धूल के कण फंस जाते हैं, वह अपारदर्शी हो जाता है, अर्थात वह गंदा हो जाता है, उसी प्रकार उसी प्रकार जब मनुष्य के मन में क्रोध आदि हर्षित विचार आते हैं तो मन भर जाता है।

काव्यगत सौन्दर्य भाषा-ब्रज। शैली-मुक्तक। रस-शान्त। छन्द दोहा। अलंकार-रूपक, अनुप्रास तथा श्लेष। गुणप्रसाद।
अलंकारअनुप्रास अलंकार ‘चाहत चटक’ और ‘रज राजस’ में ‘घ’, ‘र’ और ‘ज’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है। रूपक अलंकार ‘नेह-चीकने’ में प्रेमरूपी तेल का वर्णन किया गया है। इसलिए यहाँ रूपक अलंकार है।
श्लेष अलंकार इस पद्यांश में ‘चटक’ शब्द के अनेक अर्थ है। इसलिए यहाँ श्लेष अलंकार है।

स्वारथु सुकृतु न श्रम वृथा, देखि बिहंग बिचारि।
बाजि पराए पानि परि, हूँ पच्छीनु न मारि ॥

शब्दार्थ स्वारथु = स्वार्थी। सुकृतु = पुण्य कार्य। श्रम वृथा = व्यर्थ को परिश्रम। बिहंग = पक्षी। बाजि = (i) बाज पक्षी तथा (ii) राजा जयसिंह। पानि = हाथ। पच्छीनु = पक्षियों को, अपने पक्ष वालों को।

कवि बिहारीलाल जी ने राजा जयसिंह को बाज की भाँति दुव्र्व्यवहार कहा है कि है (राजा जयसिंह रूपी) बाज इन छोटे पक्षियों (अपने साथी) अर्थात छोटे राजाओं को मारने से तेरा क्या स्वार्थ सिद्ध होता है अर्थात् क्या फायदा होगा। न तो ये सत्कर्म है और न ही तेरे द्वारा किया श्रम (काम) सार्थक है।

अतः हे बाज! तू मली-भाँते पहले विचार-विमर्श कर, उसके बाद कोई काम कर। इस तरह दूसरों के बहकावे में आकर अपने सह-साथियों (पक्षियों) का संहार न कर। तू औरंगजेब के कहने पर अपने पक्ष के हिन्दू राजाओं पर आक्रमण करके उनका संहार मत कर

काव्यगत सौन्दर्य भाषा-ब्रज। शैली-मुक्तक। रस-शान्त। छन्द-दोहा।अनुप्रास अलंकार ‘विहंग बिचारि’ और ‘पराएँ पानि परि’ में ” और ‘प’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है। श्लेष अलंकार ‘पराएँ पानी परि’ में अनेक अर्थों का बोध होने से यहाँ श्लेष अलंकार है।
अन्योक्ति अलंकार ‘विहंग’ शब्द अप्रस्तुत विधान है। इसलिए यहाँ अन्योक्ति अलंकार है।

अलंकार अनुप्रास अलंकार ‘बुरी बुराई’ और ‘निकलंकु मयंकु’ में ‘ब’, ‘र’ और ‘क’ वर्ण की पुनरावृत्ति होने से यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
दृष्टान्त अलंकार इस पद्यांश में दुष्ट व्यक्ति की मनोदशा को चन्द्रमा के उदाहरण द्वारा बताया गया है, जिस कारण यहाँ दृष्टान्त अलंकार है।

बुरी बुराई जौ तजे, तौ चितु खरौ डरातु ।
ज्यौं निकलंकु मयंकु लखि, गनैं लोग उतपातु ॥

शब्दार्थ बुरी बुरा व्यक्ति; तजे- त्याग दे, तो तब भी, खरौ = बहुत अधिकानिकलंकु = कलंकरहित। मयंकु = चन्द्रमा। गनै = गिनने लगते हैं। उतपातु = अमंगल।

यदि कोई बुरा व्यक्ति अचानक अपनी बुराई को त्याग कर अच्छा व्यवहार करने लगे तो मन उससे अधिक भयभीत हो जाता है। उदाहरण के लिए, चंद्रमा को बिना दोष के देखना, लोग इसे अपशकुन मानने लगते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार चन्द्रमा का बेदाग होना असंभव है, उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति के लिए भी एकाएक बुराई का परित्याग करना असंभव है।

काव्यगत सौन्दर्य भाषा-ब्रज। शैली-मुक्तक। रस–शान्त। छन्द–दोहा। गुण–प्रसाद।।अलंकार-‘बुरी बुराई’ में अनुप्रास तथा चन्द्रमा का उदाहरण देने में दृष्टान्त।

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