रहीम के दोहे अर्थ सहित | Rahim Ke Dohe arth sahit

रहीम के दोहे अर्थ सहित

 

RAHIM KE DOHE » रहीम के दोहे अर्थ सहित

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Rahim Ke Dohe : रहीम दास जी का सामान्य परिचय

उपनाम रहीम दास 
पिता का नाम  बैरम खां
माता का नाम सुल्ताना बेगम

जन्मस्थान लाहौर, मुगल साम्राज्य

रहीम का जन्म लाहौर (अब पाकिस्तान) में 1556 ई. में हुआ था। उनके पिता बैरम खान हुमायूँ के सबसे भरोसेमंद प्रमुखों में से एक थे। हुमायूँ की मृत्यु के बाद, बैरम खान ने तेरह वर्षीय अकबर का राज्याभिषेक किया। अब्दुर्रहीम खानखाना अपनी रचनाओं के कारण आज भी जीवित हैं। अकबर के नवरत्नों में वे अकेले ऐसे रत्न थे जिनका कलम और तलवार पर समान अधिकार था। रहीम का जीवन परिचय पढ़े

Rahim Ke Dohe  | रहीम के दोहे अर्थ सहित

रहीम दास के दोहे दोहे हिंदी अर्थ सहित 1 से 10


छिमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।

कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात

अर्थ: इस दोहे में रहीम दास जी कहते है क्षमा बड़ों को और शरारत छोटों को अच्छी लगती है। दूसरे शब्दों में, अगर नाबालिग बदमाशी कर रहे हैं, तो यह कोई बड़ी बात नहीं है और इसके लिए बुजुर्गों को माफ कर दिया जाना चाहिए। अगर छोटे लोग गड़बड़ी पैदा करते हैं तो उनकी भी गड़बड़ी छोटी होगी। उदाहरण के लिए, अगर कोई कीड़ा (भृगु) लात मारता है, तो भी वह कोई नुकसान नहीं करता है।

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।।

अर्थ: रहीम दास जी कहते है वृक्ष न तो अपना फल खाते हैं और न ही सरोवर अपना जल स्वयं पीता है। इसी तरह अच्छे और स्वामी वे हैं जो दूसरों के काम के लिए धन जमा करते हैं।


खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।

रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान॥

अर्थ : रहीम दास जी कहते है संसार जानता है कि शराब , रक्त, खांसी, सुख, शत्रुता, प्रेम और मद्यपान छिपा नहीं जा सकता। खैर (कथा का दाग), खून, खांसी, खुशी, दुश्मनी, प्यार और शराब का नशा तो सारी दुनिया जानती है; इन बातों को न तो छुपाया जाता है और न ही छुपाया जाता है।

जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय॥

अर्थ : रहीम दास जी कहते है जब छोटे लोग तरक्की करते हैं तो बहुत हिचकिचाते हैं। शतरंज की तरह ही, जब मोहरा भ्रमित हो जाता है, तो वह कुटिल चाल चलने लगता है।


बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय॥

अर्थ: रहीम के दोहे जब चीजें गलत हो जाती हैं, तो वह काम नहीं करती, भले ही कोई बहुत कोशिश करे। जैसे दूध को पीटने से मक्खन नहीं निकलता। अर्थात मनुष्य को सोच समझकर व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि यदि किसी कारणवश कुछ बिगड़ जाता है तो ऐसा करना कठिन होता है, क्योंकि एक बार दूध टूट जाने पर बहुत प्रयास करने के बाद भी मक्खन का माखन नहीं हो पाएगा।

आब गई आदर गया, नैनन गया सनेहि।
ये तीनों तब ही गये, जबहि कहा कछु देहि॥

अर्थ: जैसे ही कोई कुछ मांगता है, आंखों का मान, सम्मान और प्यार चला जाता है।मांगने वाले व्यक्ति का अभिमान चला गया, उसकी इज्जत चली गई, और उसकी आँखों से प्यार की भावना चली गई। ये तीनों तब चले गए जब उन्होंने कहा कि यह कुछ देता है, यानी जब भी आप किसी से कुछ मांगते हैं। यानी भिक्षा मांगना अपने आप को अपनी ही नजरों से गिरा देना है, इसलिए कभी भीख मांगने जैसा कोई काम न करें।

खीरा सिर ते काटिये, मलियत नमक लगाय।
रहिमन करुये मुखन को, चहियत इहै सजाय॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है खीरा को सिर से काटकर नमक लगाना चाहिए। अगर किसी के मुंह से कड़वी आवाज निकले तो उसे भी उसी तरह सजा मिलनी चाहिए।

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है जो कुछ नहीं चाहता वह राजाओं का राजा है। क्योंकि उन्हें कुछ नहीं चाहिए, उन्हें परवाह नहीं है और मन पूरी तरह से लापरवाह है।

जे गरीब पर हित करैं, हे रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है जो लोग गरीबों का भला करते हैं वे सबसे बड़े होते हैं। सुदामा कहते हैं, कृष्ण के साथ दोस्ती भी एक आध्यात्मिक अभ्यास है।

जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।

बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है दीपक के किरदार की तरह एक बेटे का किरदार भी कुछ ऐसा ही है। दोनों पहले प्रकाश प्रदान करते हैं, लेकिन जैसे-जैसे वे बढ़ते हैं, अंधेरा होता जाता है।

रहीम के दोहे अर्थ सहित (Rahim Ke Dohe) 11 से 20

रहीम के दोहे और उनका अर्थ rahim ke dohe with meaning

रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है बड़े को देखते समय छोटों को बाहर नहीं निकालना चाहिए। क्योंकि जहां काम छोटा है वहां कुछ भी बड़ा नहीं किया जा सकता है। तलवार सुई के काम को कैसे कर सकती है ।

बड़े काम ओछो करै, तो न बड़ाई होय।
ज्यों रहीम हनुमंत को, गिरिधर कहे न कोय॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है जब लोग छोटे उद्देश्यों के लिए महान कार्य करते हैं, तो उनकी प्रशंसा नहीं होती है। जब हनुमान जी ने  तोधोलागिरी को उठाया तो उन्हें ‘गिरिधर’ नहीं कहा गया क्योंकि वे राज्य में पहाड़ लाए थे, लेकिन जब श्री कृष्ण ने पहाड़ उठाया, तो उन्हें ‘गिरिधर’ कहा गया, क्योंकि उन्होंने सभी की रक्षा के लिए पहाड़ उठाया था।

माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि।
फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है माली को आते देख कलियाँ कहती हैं कि आज उसने फूल चुन लिए, लेकिन कल हमारी भी बारी आएगी, क्योंकि कल हम भी खिलेंगे और फूल बनेंगे।

एकहि साधै सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहि सींचबो, फूलहि फलहि अघाय॥

अर्थ: रहीम दास जी  के अनुसार  एक को साधने से सब सधते हैं। सब को साधने से सभी के जाने की आशंका रहती है। वैसे ही जैसे किसी पौधे के जड़ मात्र को सींचने से फूल और फल सभी को पानी प्राप्त हो जाता है और उन्हें अलग-अलग सींचने की जरूरत नहीं होती है।

रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि।
उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है जो व्यक्ति किसी से कुछ माँगने जा रहा है, वह मर चुका है, लेकिन उससे पहले वे लोग जिनका मुँह से नहीं निकलता है, वे मर जाते हैं।

रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।

हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है कुछ दिन रहने वाली विपदा अच्छी होती है। क्योंकि इसी दौरान यह पता चलता है कि दुनिया में कौन हमारा हित या अनहित सोचता है।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर

 

रहीम के दोहे अर्थ सहित rahim ke dohe with meaning

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।

पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है खजूर के पेड़ की भाँति बड़े होने का कोई फायदा नहीं है। खजूर के रूप में यह बहुत बड़ा होता है, लेकिन इसका फल इतना दूर होता है कि इसे तोड़ना मुश्किल होता है।

रहिमन निज मन की व्यथा, मन में राखो गोय।

सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है अपने दुख को अपने मन में ही रखनी चाहिए। दूसरों को सुनाने से लोग सिर्फ उसका मजाक उड़ाते हैं परन्तु दुख को कोई बांटता है।

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर। जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥
रहीम के दोहे अर्थ सहित

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।

जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥

अर्थ  : रहीम दास जी कहते है जब बुरे दिन आए तो चुप बैठ जाना चाहिए, क्योंकि अच्छे दिन आने पर बात बनते  देर नहीं लगती।

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥

अर्थ : रहीम दास जी कहते है मन से अहंकार को दूर कर कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे सुनने में दूसरों को भी खुशी मिले और उन्हें भी खुशी मिले।

मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फट जाये तो ना मिले, कोटिन करो उपाय॥

अर्थ: रहीम दास जी कहते है जब तक मन, मोती, फूल, दूध और रस सरल और सामान्य रहते हैं, वे अच्छे लगते हैं, लेकिन एक बार फटने और लाखों उपाय करने के बाद, वे कभी भी अपने प्राकृतिक रूप में नहीं लौटते।

रहीम के दोहे अर्थ सहित (Rahim Ke Dohe) 21 से 30

रहिमह ओछे नरन सो, बैर भली ना प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँति विपरीत॥

भावार्थ : रहीम दास जी कहते है नीच विचारों वाले लोगों से न तो प्रेम और न ही शत्रुता अच्छी होती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई कुत्ता काटता या चाटता है, तो दोनों को विरोधी नहीं माना जाता है।

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥

अर्थ : प्रेम का धागा कभी नहीं टूटना चाहिए क्योंकि एक बार टूट जाने पर वह जुड़ता नहीं और बंधा भी तो गांठ बन ही जाता है। अर्थात पहले जैसे सम्भन्ध नहीं रह जाते

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥

अर्थ: इस दोहे में रहीम ने पानी को तीन अर्थों में प्रयोग किया है। पानी का पहला अर्थ मनुष्य के संदर्भ में है जब इसका मतलब विनम्रता से है। रहीम कह रहे हैं कि मनुष्य में हमेशा विनम्रता (पानी) होना चाहिए।

पानी का दूसरा अर्थ आभा, तेज या चमक से है जिसके बिना मोती का कोई मूल्य नहीं। पानी का तीसरा अर्थ जल से है जिसे आटे (चून) से जोड़कर दर्शाया गया है। रहीम का कहना है कि जिस तरह आटे का अस्तित्व पानी के बिना नम्र नहीं हो सकता और मोती का मूल्य उसकी आभा के बिना नहीं हो सकता है, उसी तरह मनुष्य को भी अपने व्यवहार में हमेशा पानी (विनम्रता) रखना चाहिए जिसके बिना उसका मूल्यह्रास होता है।

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै, ज्यौं मेंहदी को रंग

अर्थ रहीम कहते हैं धन्य हैं वे पुरुष जो दूसरों पर उपकार करते हैं। उन पर रंग उसी तरह निकलता है जैसे मेहंदी बांटने वाले को अलग से रंग लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।

जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि।।

अर्थ रहीम कहते हैं कि किसी बड़ी वस्तु को देखकर छोटी वस्तु को नहीं फेंकना चाहिए। जहा एक छोटे सी सुई उपयोगी है, एक गरीब तलवार क्या कर सकती है

जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं

गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं।।

रहीम के अनुसार  बड़े को छोटा कहने से बड़े का बड़प्पन नहीं घटता, क्योंकि गिरिधर (कृष्ण) को मुरलीधर कहने से कृष्ण की महिमा में नहीं घट जाती है।

जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह। 

धरती ही पर परत है, सीत घाम औ मेह।।

अर्थ रहीम के अनुसार शरीर को सुख और दुख सहना चाहिए क्योंकि इस भूमि पर सर्दी, गर्मी और बारिश तीन मौसम की मार पड़ती है

दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं। 

जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के माहिं।।

अर्थ रहीम के अनुसार कौए और कोयल के रंग एक जैसे होते हैं। लेकिन उनके बोलने के गुणों मे अंतर होता है

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय। 

सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय।।

अर्थ रहीम के अनुसार मन की उदासी को मन में छिपाकर रखना चाहिए। दूसरो के दुख को सुनकर भले ही लोग उसे स्वीकार कर लें लेकिन उसे बांटने से कम करने वाला कोई नहीं है

रहिमन नीर पखान, बूड़े पै सीझै नहीं। 

तैसे मूरख ज्ञान, बूझै पै सूझै नहीं।।

अर्थ रहीम के अनुसार पत्थर पानी में रहकर भी नरम नहीं होता, वही  मूर्ख की स्थिति होती है, ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी उसे कुछ भी समझ में नहीं आता है। कहने कहने का अर्थ है मूर्ख ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी मूर्खता वाली हरकते करता है

रहीम के दोहे अर्थ सहित (Rahim Ke Dohe)31 से 40

राम न जाते हरिन संग से न रावण साथ। 

जो रहीम भावी कतहूँ होत आपने हाथ।।

रहीम दास जी कहते है राम हिरण के पीछे चले गए और सीता का अपहरण कर लिया गया क्योंकि यह होना ही था – उस पर हमारा कोई नियंत्रण में नहीं होती इसलिए राम सोने के मृग के पीछे गए और  सीता को लंका ले गए।

 रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार। 

रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार।।

 भावार्थ : यदि आपका प्रियजन सौ बार रूठ  हो जाए, तब भी क्रोधित प्रियजन  मनाना चाहिए, क्योंकि मोती की माला टूट जाए तो इन मोतियों को बार-बार पिरो लिया जाता है ।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग।

चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।

अर्थ: रहीम का कहना है कि जो अच्छे स्वभाव के इंसान हैं, बुरी संगत भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। चंदन के पेड़ पर जहरीले सांपों का कोई जहरीला प्रभाव नहीं हो सकता, भले ही वह उसके चारों ओर लिपटा हो।

जे सुलगे ते बुझि गये बुझे तो सुलगे नाहि

रहिमन दाहे प्रेम के बुझि बुझि के सुलगाहि ।

अर्थ:- रहीमदास जी कहते है आग धीमी गति से जलने से बुझती है और बुझने पर फिर नहीं जलती। प्रेम की आग एक ऐसी आग है जो बुझने के बाद फिर जल उठती है।

देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन।

लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते देने वाला भगवान है जो हमें   दिन-रात दे रहा है। लेकिन लोग समझते हैं कि मैं दे रहा हूं, इसलिए दान देते समय  मेरी आंखें अनजाने में शर्म से नीचे गिर जाती हैं।

रहिमन’ गली है सांकरी, दूजो नहिं ठहराहिं।

आपु अहै, तो हरि नहीं, हरि, तो आपुन नाहिं॥

 अर्थ रहीमदास जी कहते है हृदय की गली बहुत सकरी होती है इसमें दो लोग नहीं ठहर सकते  है या तो आप इसमें अहंकार को बसा ले या फिर इस्वर को

अब रहीम मुसकिल परी, गाढ़े दोऊ काम।

सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है इस दुनिया में बहुत  मुश्किल है अगर आप सत्य का साथ देते है है दुनिया आप से नाराज रहेंगे अगर आप इस दुन्या में झूठ बोलते है तो आपको कभी भगवान नहीं मिलेंगे।

Rahim Das ke Dohe with Meaning

अंजन दियो तो किरकिरी, सुरमा दियो न जाय।

जिन आँखिन सों हरि लख्यो, रहिमन बलि बलि जाय॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है इन आँखों में  काजल और सुरमा लगाना व्यर्थ है जो लोग इन आँखों में ईश्वर को बसाते  है वे लोग धन्य होते है

उरग तुरग नारी नृपति, नीच जाति हथियार।

रहिमन इन्हें संभारिए, पलटत लगै न बार ॥

 अर्थ रहीमदास जी कहते है संकट में फंसे सांप, सबसे परेशान घोड़े,  पीड़ित महिला, क्रोध की आग में जलने वाले राजा,कुटिल व्यक्ति और तेज धार वाले हथियार से हमेशा दूरी बनाकर रखनी चाहिए।इन्हे पलटे देर नहीं लगती ये आपका अहित भी कर सकते है इनसे आपको सावधान रहना चाहिए।

कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।

बिपति कसौटी जे कसे, तेई सांचे मीत ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते हैजिनके पास सम्पति होती है उनके पास मित्र भी आपने आप बहुत बन जाते है लेकिन  सच्चे मित्र तो वे ही हैं जो विपत्ति की कसौटी पर कसे जाने पर खरे उतरते हैं। अर्थात विपत्ति में जो  साथ देता है वही सच्चा मित्र है।

रहीम के दोहे अर्थ सहित (Rahim Ke Dohe) 41 से 50

कहु रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग।

वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग ॥

 अर्थ रहीमदास जी कहते है दो विपरीत सोच वाले व्यक्तियों की आपस में नहीं बनती हैबेर के पेड़ पर काँटे लगें तो केले का पेड़ कोमल होता है। हवा के झोंके के कारण बेर की शाखाएँ चंचलता से हिलती हैं, तो केले के पेड़ का हर हिस्सा फट जाता है।

समय पाय फल होता हैं, समय पाय झरी जात।

सदा रहे नहीं एक सी, का रहीम पछितात॥

 अर्थ रहीमदास जी कहते है की समय आने पर ही फल ही फल मिलता है और समय बीत जाने पर पत्ते झड़ जाते है कहने का अर्थ है सदा एक से दिन नहीं रहते है कभी अच्छे और कभी बुरे

रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है इस दोहे मे पानी को तीन अर्थ है पानी का पहला अर्थ मनुष्य की विनम्रता है पानी का एक और अर्थ है आभा, चमक या चमक जिसके बिना मोती बेकार है। पानी का तीसरा अर्थ है पानी से है

रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय।

नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है अगर आप किसी काम को लगन से करने की कोशिश करेंगे तो आप अवश्य सफल होंगे क्योकि लगन से नारायण को भी बस में भी किया जा सकता है।

गुन ते लेत रहीम जन, सलिल कूप ते काढि।

कूपहु ते कहूँ होत है, मन काहू को बाढी॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है जैसे गहरे कुएँ से बाल्टी भरकर पानी निकाला जा सकता है, वैसे ही अच्छे कर्मों से किसी के भी दिल में अपने लिए प्यार पैदा किया जा सकता है

रहीम के दोहे और उनके अर्थ

लोहे की न लोहार की, रहिमन कही विचार ।

जा हनि मारे सीस पै, ताही की तलवार॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है तलवार लोहे अथवा लोहार की नहीं होती तलवार उस वीर की कहलाएगी जो शौर्य से शत्रु को मारकर अपना जीवन समाप्त कर लेता है।

तासों ही कछु पाइए, कीजे जाकी आस।
रीते सरवर पर गए, कैसे बुझे पियास॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है जहा कुछ प्राप्त हो सकता है, उससे ही कुछ अपेक्षा करना उचित है।क्योकि सूखा तलाब किसी की प्यास नहीं बुझा सकता है

कहु रहीम केतिक रही, केतिक गई बिहाय।
माया ममता मोह परि, अन्त चले पछिताय ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है ज़रा सोचिए कि कितना जीवन बचा है और कितना व्यर्थ गया है क्योंकि माया, प्रेम और मोह संसार के क्षणिक सुख है लेकिन आध्यात्मिक सुख स्थायी सुख है

कहा करौं बैकुंठ लै, कल्प बृच्छ की छाँह।
रहिमन ढाक सुहावनो, जो गल पीतम बाँह॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है स्वर्ग का सुख और कल्पवृक्ष की छाया नहीं चाहिए मुझे वह ढाक का पेड़ बहुत पसंद है जहां मैं अपने प्रीतम के गले में हाथ डालकर बैठ सकता हूं।

दादुर, मोर, किसान मन, लग्यौ रहै धन मांहि।
पै रहीम चाकत रटनि, सरवर को कोउ नाहि ॥

रहीम के दोहे अर्थ सहित (Rahim Ke Dohe)51 से 60

धन थोरो इज्जत बड़ी, कह रहीम का बात।
जैसे कुल की कुलवधु, चिथड़न माहि समात ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है इज्जत धन से बड़ी होती है

प्रीतम छवि नैनन बसि, पर छवि कहां समाय ।
भरी सराय रहीम लखि, आपु पथिक फिरि जाय ॥

रहीम के दोहे और अर्थ

अर्थ रहीमदास जी कहते है आँखों में एक और छवि कैसे बस सकती है  जिसमें प्रिय की सुंदर छवि बसती है

बड़े बड़ाई ना करें, बड़ो न बोलें बोल ।
रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका है मोल ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है बड़े लोग अपनी बड़ाई खुद नहीं करते

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय ।
रहिमन बिगरै दूध को, मथे न माखन होय ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है बिगड़ी हुई बात कभी नहीं बनती है जैसे फटे दूध को लाख मथकर भी मक्खन नहीं निकलता

रहीम के दोहे Class 6 रहीम के दोहे अर्थ Class 9

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय ।
टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े तो गांठ पड़ जाय ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है अगर विश्वास टूट जाता है तो उसे वापस नहीं किया जा सकता।अगर वापस रिश्ता बनता है लेकिन एक गाँठ बन जाएगी।

वरू रहीम कानन भल्यो वास करिय फल भोग।
बंधू मध्य धनहीन ह्वै, बसिबो उचित न योग॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है गरीब भाइयों के बीच रहना अच्छा नहीं है

रहिमन नीर पखान, बूड़े पै सीझै नहीं।
तैसे मूरख ज्ञान, बूझै पै सूझै नहीं॥

रहीम के दोहे अर्थ सहित (Rahim Ke Dohe)

अर्थ रहीमदास जी कहते है जैसे पत्थर पानी में रहने पर भी नरम नहीं होता, जैसे मूर्ख की स्थिति होती है, ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी उसे कुछ भी समझ में नहीं आता है।

ओछे को सतसंग रहिमन तजहु अंगार ज्यों।
तातो जारै अंग सीरै पै कारौ लगै॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है निच प्रवति वाले व्यक्ति का साथ छोड़ दें वह कोयले की तरह है। यह गर्म रहता है यह शरीर को जला देता है, और जब यह ठंडा हो जाता है, तब भी यह शरीर को काला कर देता है।

धनि रहीम गति मीन की जल बिछुरत जिय जाय।
जियत कंज तजि अनत वसि कहा भौरे को भाय।।

अर्थ रहीमदास जी कहते है मछली का प्रेम धन्य होता है वह अपने प्रेमी से अलग होकर उसके लिए अपनी जान दे देती है

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है जो व्यक्ति उत्तम चरित्र के होते है उन पर बुरे लोगो का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता है उदारण में रहीम ने चन्दन के पेड़ का लिया है उसपर विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है जबकि काफी सर्प चिपके रहते है

रहीम के दोहे अर्थ सहित( Rahim Ke Dohe) 61 से 70

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन देत समेत ।
ते रहिमन पसु ते अधिक, रीझेहुं कछु न देत ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है संगीत की ध्वनि से मोहित होकर, हिरण अपने शरीर को शिकारी को सौंप देता है। और मनुष्य धन से अपना जीवन खो देता है। लेकिन वे लोग भी जानवर से मर गए, जो संतुष्ट होने पर भी कुछ नहीं देते।

मान सहित विष खाय के, संभु भए जगदीस ।
बिना मान अमृत पिए, राहु कटायो सीस ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते हैआदर से जब शिव ने विष निगल लिया तो वे जगदीश कहलाए, लेकिन आदर के अभाव में राहु ने अमृत पीकर उनका सिर काट दिया गया ।

रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय ।
हित अनहित मा जगत में, जानि परत सब कोय ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है कुछ दिन की विपत्ति अच्छी होती है इसमें आपको अच्छा बुरा अपने पराये का पता चल जाता है

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है पेड़ न तो अपना फल खाते हैं और न ही तालाब अपना पानी खुद पीता है। इसी तरह अच्छे और सज्जन व्यक्ति वे होते हैं जो दूसरों के काम के लिए धन जमा करते हैं।

जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह।
धरती ही पर परत है, सीत घाम औ मेह।।

अर्थ रहीमदास जी कहते है जिस प्रकार यह भूमि ठंड, गर्मी और बारिश का सहन करती है, उसी तरह व्यक्ति को सुख और दुख की आदत डालनी चाहिए।

को रहीम पर द्वार पै, जात न जिय सकुचात।
संपति के सब जात हैं, बिपति सबै लै जात ॥


जो रहीम मन हाथ है, तो मन कहुं किन जाहि।
ज्यों जल में छाया परे, काया भीजत नाहिं ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है जिसके मन पर नियंत्रण है, उसका शरीर कहीं भी नहीं जा सकता, भले ही वह सबसे बड़ी बुराइयों को प्राप्त कर ले। जैसे पानी में परावर्तन से शरीर भीगता नहीं है। यानी मन को साधना से शरीर स्वत: स्वस्थ हो जाता है।

दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।
जो रहीम दीनहिं लखत, दीनबन्धु सम होय ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते है ग़रीबों की नज़र सब पर पड़ती है, मगर ग़रीब को कोई नहीं देखता। जो प्यार से गरीबों की परवाह करता है, उनकी मदद करता है,वह उनके लिए दीनबंधु भगवान के समान हो जाता है।

दुरदिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिचानि।
सोच नहीं वित हानि को, जो न होय हित हानि ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते कि जिंदगी में जब बुरे दिन आते हैं तो हर कोई उसे पहचानना भूल जाता है। उस समय, यदि आप दयालु लोगों से सम्मान और प्यार प्राप्त करना जारी रखते हैं, तो धन खोने का दर्द कम हो जाता है।

रहिमन कबहुं बड़ेन के, नाहिं गरब को लेस ।
भार धरे संसार को, तऊ कहावत सेस ॥

अर्थ रहीमदास जी कहते कि बड़े लोग वही होते है जिनको अहंकार नहीं होता है यह सोचना गलत है कि एक अमीर आदमी बड़ा होता है आदमी बड़ा वह होता है उसे कभी किसी चीज पर गर्व नहीं होता है। सुख-दुख में सबकी सहायता करता है, सबका भला सोचता है, अर्थात् सारे जगत् का भार वहन करता है, वह शेषनाग कहलाने योग्य है।

रहीम के दोहे अर्थ सहित (Rahim Ke Dohe)71 से 80

रहिमन विद्या बुद्धि नहीं, नहीं धरम जस दान ।
भू पर जनम वृथा धरै, पसु बिन पूंछ विषान ॥

रहीमदास जी कहते कि जिसके पास बुद्धि नहीं है और जिसे शिक्षा पसंद नहीं है, जिसने धर्म और दान नहीं किया है और इस दुनिया में आकर प्रसिद्धि नहीं पाई है; वह व्यक्ति व्यर्थ और पृथ्वी पर एक बोझ बनकर पैदा हुआ है । एक अनजान व्यक्ति और एक जानवर के बीच सिर्फ पूंछ का अंतर है। यानी यह व्यक्ति बिना पूंछ वाला जानवर है

रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच ।
मांस दियो शिवि भूप ने, दीन्हो हाड़ दधीच ॥

अर्थ: रहीमदास जी कहते कि दान करते समय स्वार्थ,, मित्रता आदि के बारे में नहीं सोचना चाहिए। राजा शिव ने अपने शरीर का दान दिया और दधीचि ऋषि ने अपनी हड्डियों का दान किया। इसलिए परोपकार में अपने प्राणों की आहुति देने में संकोच नहीं करना चाहिए।

धन दारा अरु सुतन , सो लग्यो है नित चित ।

नहि रहीम कोऊ लख्यो , गाढे दिन को मित॥

अर्थ: रहीमदास जी कहते हैं कि मनुष्य को सदैव अपना मन धन, यौवन और संतान में नहीं लगाना चाहिए। क्योंकि जरूरत पड़ने पर उनमें से कोई भी आपका साथ नहीं देगा! अपना मन भगवान की भक्ति में लगाएं क्योंकि मुश्किल की घड़ी में वही आपका साथ देगा।

मांगे मुकरि न को गयो , केहि न त्यागियो साथ। 

मांगत आगे सुख लह्यो , ते रहीम रघुनाथ।।

अर्थ: रहीमदास जी कहते कि मनुष्य जो मांगता है वह देने से हर कोई इंकार करता है और कोई उसे नहीं देता। उस व्यक्ति में सेलोग अपना साथ भी छोड़ देते है। उस व्यक्ति से खुश रहना बेहतर है जो पूछता है कि भगवान स्वयं किस पर उदार है।

रहिमन तब लगि ठहरिये, दान मान सम्मान।

घटता मान देखिये जबहि, तुरतहि करिए पयान।।

अर्थ: रहीम दास जी कहते हैं कि मनुष्य को तब तक कहीं पर रहना चाहिए जब तक उसके पास सम्मान और सेवा है। जब आप नोटिस करें कि आपके सम्मान में कमी आ रही है, तो आपको तुरंत वहां से निकल जाना चाहिए।

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