कवि बिहारीलाल का जीवन परिचय | Biharilal biography in Hindi

कवि बिहारीलाल जीवन-परिचय

बिहारीलाल का जीवन परिचय ( Biharilal biography in Hindi )

बिहारीलाल का जन्म 1603 के आसपास मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले के वसुआ गोविंदपुर में हुआ था। जब बिहारी की आयु 8 वर्ष थी ।तब इनके पिता ओरछा आ गए। बिहारी पिता का नाम केशवराय था। इनका बाल्यकाल बुन्देलखण्ड में व्यतीत हुआ। जब बिहारी 8 साल के थे, तब उनके पिता उन्हें ओरछा ले आए और उनका बचपन बुंदेलखंड में बीता।बिहारीलाल जाति के माथुर चौबे थे।बिहारीलाल के गुरु नरहरिदास था। कवि बिहारीलाल हिन्दी साहित्य के रीति काल के प्रसिद्ध कवि थे । वे मूलत: श्रृंगार रस के कवि हैं। युवावस्था सुसराल मथुरा में दोहों से स्पष्ट होती है

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“जन्म ग्वालियर जानिये, खण्ड बुंदेल बाल।
तरुनाई आयी सुधर, मथुरा बसि ससुराल ।।”
“प्रकट भये द्विजराज कुल, सूवस बसे ब्रज आई ।
मेरो हरौ क्लेश सब, केसौ- केसौ राई।।”

 बिहारी का विवाह मथुरा के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। विवाह के बाद बिहारी ससुराल में रहने लगे, लेकिन जब उन्हें वहां अपमानित महसूस हुआ तो वह आगरा आ गए। आगरा से जयपुर तक राजा जय सिंह के दरबार में गए। कहा जाता है कि जयपुर के राजा राजा जयसिंह उस समय अपनी नवविवाहित पत्नी के साथ यवन में डूबे रहते थे। तब बिहारी ने निम्नलिखित दोहे लिखकर राजा के पास भेज दिए

नहिं पराग नहिं मधुर मधु , नहिं विकास यहि काल ।
अली कली ही सौं बिन्थ्यौ , आगे कौन हवाल ।।

इस दोहे को सुनकर राजा की आंखें खुल गईं और फिर वह अपने सरकारी काम में लग गया। राजा जयसिंह ने बिहारी को अपना राज कवि बनाया। राजा जयसिंह बिहारी की काव्य प्रतिभा पर बहुत मोहित थे। शाही दरबार में रहकर बिहारी ने अपनी ‘सतसाई’ की रचना की। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद, बिहारी जयपुर छोड़कर वृंदावन चले गए और वहां भगवान कृष्ण की पूजा करने लगे। 1663 में बिहारी जी की मृत्यु हो गई।

पढ़े बिहारी के दोहे 

कवि बिहारीलाल का जीवन परिचय एक नज़र में Biharilal biography in Hindi

 नाम Name बिहारी

पुरा नाम Full Name बिहारीलाल

जन्म तारीख Date of Birth 1603

जन्म स्थान Place of Birth मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले

मृत्यु Death  1663

नागरिकता Nationality भारतीय

पारिवारिक जानकारी Family Information

पिता का नाम Father’s Name केशवराय

माता का नाम Mother’s Name ज्ञात नहीं

गुरु का नाम नरहरिदास

पत्नी का नाम ज्ञात नहीं

भाई बहन Siblings

अन्य जानकारी Other Information सम्मान Awards

बिहारी का साहित्यिक परिचय

बिहारीलाल रीति काल के प्रतिनिधि कवि हैं। इनकी रचना का नाम ‘ बिहारी सतसई ‘ है । इनकी ‘ सतसई ‘ हिन्दी साहित्य की एक अमूल्य निधि है जिसके कारण बिहारी लोक प्रसिद्ध हैं। इनकी ‘ सतसई ‘ में भक्ति , नीति और श्रृंगार की प्रधानता है।संक्षेप में बिहारी हिन्दी साहित्य के महान कवियों में गिने जाते हैं। इनकी ‘ सतसई ‘ के दोहों के सम्बन्ध में कहा जाता है

सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गंभीर॥

काव्यगत विशेषताएं

बिहारी जी की कविताएं सिंगार रस पर आधारित हां इन्होंने श्रंगार के दोनों पक्ष वियोग और संयोग दोनों का वर्णन किया है

बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।
सोह करे, भौंहनु हंसे दैन कहे, नटि जाय॥

इनकी कविता में सूफी कवियों का भी प्रभाव मालूम पड़ता है

औंधाई सीसी सुलखि, बिरह विथा विलसात।
बीचहिं सूखि गुलाब गो, छीटों छुयो न गात॥

इनकी भक्ति में राधा कृष्ण का ही वर्णन मिलता है

मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाई परे, स्याम हरित दुति होय॥

इन्होंने अपनी कविता में नीति और ज्ञान पर भी दोहे लिखे पर इनकी संख्या बहुत कम है

मति न नीति गलीत यह, जो धन धरिये जोर।
खाये खर्चे जो बचे तो जोरिये करोर॥

 इन्होंने काफी जगह पर प्रकृति का चित्रण भी दिया है बिहारी जी को ज्योतिष वैदिक गणित विज्ञान आदि का भी ज्ञान था जिसका वर्णन इन्होंने अपने दोनों में किया है।

कहत सवै वेदीं दिये आंगु दस गुनो होतु।
तिय लिलार बेंदी दियैं अगिनतु बढत उदोतु॥

भाषा-शैली

कवि बिहारी लाल ने अपनी भाषा में ब्रज भाषा का ही प्रयोग किया है इनकी भाषा में मुहावरों का प्रयोग मिलता है इनकी रचनाओं की शैली मुक्तक शैली और छंद में दोहे का प्रयोग किया है बिहारी की कविता में शांत, हास्य, करुण आदि रसों के उदाहरण भी मिलते हैं लेकिन मुख्य रस श्रृंगार है। बिहारी ने केवल दो छंद सोरठा को अपनाया, दोहा और सोरथा। दोहा छंदों की प्रधानता है। बिहारी दोहे समास-शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। बिहारी लाल के दोहे में अतिशयोक्ति, अन्योक्ति और सांगरूपक अलंकार हैं उदाहरण

स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा देखु विहंग विचारि।
बाज पराये पानि पर तू पच्छीनु न मारि।।

बिहारीलाल की प्रमुख रचनाएँ

बिहारी की एकमात्र रचना ‘ सतसई ‘ है।’ सतसई ‘ में नीति , भक्ति और श्रृंगार सम्बन्धी दोहे हैं। हिन्दी जगत में बिहारी ही एक मात्र ऐसे कवि हैं जिन्होंने एक छोटी सी पुस्तक की रचना कर इतनी प्रसिद्धि प्राप्त की है।

हिंदी साहित्य में स्थान

हिंदी साहित्य में बिहारी जी का स्थान महान कवि के साथ जोड़ा जाता है ये भक्ति के सर्वोच्च कवियों में से एक है बिहारी जी रीतिकाल के सर्वोच्च कवि हैं बिहारी जी के दोहे रस के सागर हैं इनका हिंदी साहित्य में अमिट स्थान है।

बिहारी किसके भक्त थे ?

बिहारी कृष्णा भक्त थे।

बिहारी के गुरु कौन थे ?

बिहारीलाल के गुरु नरहरिदास थे।

बिहारी के काव्य का मूल रस है ?

कवि बिहारीलाल हिन्दी साहित्य के रीति काल के मूलत: श्रृंगार रस के कवि हैं।

बिहारी के आश्रयदाता कहां के राजा थे ?

जयपुर के राजा राजा जयसिंह ने बिहारी को अपना राज कवि बनाया था।

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