चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन परिचय Chandragupt Maurya in Hindi

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Chandragupt Maurya

नमस्कार आज हम जानेगे चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन परिचय , Chandragupt Maurya in Hindi , Chandragupta Maurya history in hindi उनके जीवन से जुड़े सभी तथ्यों के बारे में।

चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन परिचय (Chandragupt Maurya in Hindi)

Chandragupta Maurya history in hindi सिकन्दर अपनी विजय – पताका फहराकर भारत से लौट चुका था । सिन्ध, पंजाब तथा सीमा प्रदेश का शासन उसने अपने यूनानी अधिकारियों के हाथ में दे रखा था । विदेशी अधिकारियों का शासन अत्याचारपूर्ण था । प्रजा अत्यंत दुःखी और असन्तुष्ट थी ।

सिकन्दर के आक्रमण का विरोध करने में भारतवासी सफल भले ही न हो सके थे लेकिन उनके मन में अपने देश को स्वतंत्र कराने की इच्छा बराबर बनी रहती थी । यूनानी अधिकारियों के अत्याचार से विरोध की यह आग और भी भड़क उठी । उनको आवश्यकता थी तो केवल एक ऐसे नायक की, जो इन्हें दिशा निर्देश दे सके और उनका पथ प्रदर्शक बन सके । संयोगवश चन्द्रगुप्त मौर्य जैसे साहसी और महत्त्वाकांक्षी युवक का इन्हें नेतृत्व मिल गया ।

चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन परिचय मुख्य बिंदु (Chandragupta Maurya in Hindi)

पुरा नाम Full Name चन्द्रगुप्त मौर्य (Chandragupt Maurya)

जन्म तारीख Date of Birth 340 BC

जन्म स्थान Place of Birth पाटलीपुत्र , बिहार

मृत्यु Death 2 फरवरी 1941

मृत्यु स्थान Place of Death श्रवणबेलगोला, चंद्रागिरी की पहाड़ियां, कर्नाटक (भारत)

पारिवारिक जानकारी Family Information

पिता का नाम Father’s Name नंदा

माता का नाम Mother’s Name मुरा

पत्नी का नाम Spouse Name दुर्धरा और हेलेना

पुत्र का नाम Sons Name बिंदुसार

अन्य जानकारी Other Information

गुरु का नाम आचार्य चाणक्य

प्रमुख उपलब्धियां मौर्य साम्राज्य के संस्थापक

 चन्द्रगुप्त मौर्य (Chandragupt Maurya) ने भारत भूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वालों को संगठित कर एक सेना का निर्माण किया । सेना की सहायता से चन्द्रगुप्त मौर्य ने यूनानियों को भारत भूमि से बाहर निकाल दिया और अपनी राजसत्ता स्थापित की । इस विजय से चन्द्रगुप्त मौर्य में विश्वास और उत्साह का जन्म हुआ । फलस्वरूप उसने एक विशाल सेना संगठित की और मगध साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया ।

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चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रारंभिक जीवन –

 इस सम्बन्ध में निश्चित और प्रामाणिक सामग्री उपलब्ध नहीं है। बौद्ध अनुश्रुतियों में उसको एक ग्रामीण मयूरपोषक जाति के किसी सरदार का पुत्र कहा गया है। कुछ विद्वानों के अनुसार उसके पिता की मृत्यु किसी सीमावर्ती झगड़े में पाटलिपुत्र में ही उसका जन्म हुआ। कुछ दिनों तक उसका बाल्यकाल किसी ग्रामीण के यहां व्यतीत हुआ। तत्पश्चात् एकभावित होकर अपने साथ तक्षशिला ले गया। चाणक्य ने नन्द सम्राट् द्वारा कभी अपमानित होकर उसका नारा करने एक शिकारी ने उसका पालन किया। वहीं किसी प्रकार उस पर चाणक्य की दृष्टि पड़ी जो बालक के शीर्य एवं साहस प्रतिज्ञा की थी। उसने उसी समय चन्द्रगुप्त को राजगद्दी पर प्रतिष्ठित करने का संकल्प किया।

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मालूम होता है कि किसी कारण से चन्द्रगुप्त और चाणक्य दोनों ही नन्द सप्रगट से रुष्ट थे और उन्होंने उसे अपदस्य करने में आपस में सहयोग कर षड्यंत्र किया। वास्तव में चाणक्य नन्दवंश की नीति से असन्तुष्ट था। वह पश्चिमोत्तर भारत की राजनीतिक कमजोरी से भी दुःखी था और उसके हृदय में देश के उद्धार की आग थी। वह एक महापण्डित था, तक्षशिला विश्वविद्यालय में आचार्य था।

चरण गांव का निवासी होने के कारण उसे चाणक्य तथा कुटिल गोत्र के कारण कौटिल्य कहा जाता था। उसका नाम विष्णुगुप्त था। चन्द्रगुप्त और चाणक्य का लक्ष्य एक ही था और दोनों ने नन्दवंश के विनाश
का संकल्प कर लिया था।

इस सम्बन्ध में अन्य अनुश्रुतियाँ भी हैं, किन्तु सभी इस बात पर सहमत हैं कि किसी-न-किसी रूप में चन्द्रगुप्त और चाणक्य का मिलन ही नन्दवंश के विनाश का.कारण बना।

चन्द्रगुप्त मौर्य का वंश(Chandragupt Maurya ka Vansh

चन्द्रगुप्त मौर्य (Chandragupt Maurya) के वंश के बारे में बहुत कम जानकारी है। विभिन्न ऐतिहासिक शास्त्रीय, ग्रीक और लैटिन संस्कृत साहित्य से कुछ जानकारी एकत्र करना संभव था।  चन्द्रगुप्त के जीवन के 600 साल बाद लिखे गए संस्कृत नाटक मुद्राराक्ष में, उन्हें नंदनवाय या नंद के वंशज के रूप में वर्णित किया गया है। नदराज की रानी की मुरा नाम की एक दासी थी। एक बार, नदराज युवती मुरा की सुंदरता पर मोहित हो गए और उसके साथ बलात्कार किया और उसे जन्म दिया।

सार्वजनिक शर्मिंदगी के डर से, नादराज ने मुरा और उसके बेटे को ठुकरा दिया। क्रोधित होकर चंद्रगुप्त ने चाणक्य की मदद से नंद वंश को उखाड़ फेंका और मौर्य वंश की स्थापना की। बौद्ध धर्मग्रंथों में महाबंश में चंद्रगुप्त का उल्लेख मोरिया नामक क्षत्रिय समूह के पुत्र के रूप में किया गया है। महापरिनिर्वाण सुत्त के अनुसार, मोरिया उत्तरी भारत में पिप्पलीबंस का एक क्षत्रिय समूह था। महावंशिका के अनुसार, उन्हें शाक्य क्षत्रिय समूह से संबंधित कहा जाता है।

 जैन जनश्रुति के अनुसार चन्द्रगुप्त एक ऐसे गाँव के प्रधान की कन्या के पुत्र थे जहाँ मयूर – पोष निवास करते थे । इस कारण उनका वंश ‘ मौर्य वंश ‘ कहलाया । बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार नेपाल की तराई पिपलिवन नामक एक स्थान था । यहाँ क्षत्रिय जाति के लोग निवास करते थे, इन्हें ” मौरिय ‘ कहा जाता था चन्द्रगुप्त के पिता इसी जाति के प्रधान थे, जिनकी किसी शक्तिशाली राजा द्वारा हत्या कर दी गयी ।

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मगध पर विजय

 मगध में नन्द का सुसंगठित एवं विशाल राज्य था दुर्भाग्यवश किसी भी साक्ष्य में इस प्रकार के किसी युद्ध का उल्लेख नहीं किया है। बौद्ध और जैन धर्म की जनश्रुति से ज्ञात होता है कि सर्वप्रथम चन्द्रगुप्त ने मगध साम्राज्य के केन्द्रीय भाग पर आक्रमण किया और असफल रहा। अपनी इस भूल को सुधारकर उसने सीमान्त प्रदेशों को जीता और बाद में नन्दों की राजधानी पर विजय प्राप्त की।

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बौद्ध और जैन ग्रन्थों में जो वर्णन किया गया है, वह अविश्वसनीय है। इससे केवल इतना निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह युद्ध बड़ा भयानक रहा होगा। वास्तव में चन्द्रगुप्त की यह दूसरी महत्त्वपूर्ण सफलता थी जिसके पश्चात् अब वह एक विशाल साम्राज्य क शासक बन गया था। मगध विजय के बाद ही चाणक्य ने 322 ई०पू० में चन्द्रगुप्त का राज्याभिषेक कर दिया।

सेल्यूकस से युद्ध

सिकन्दर के सेनापतियों में, जो उसके मरते ही परस्पर लड़ने लगे, सेल्यूकस (जिसने ‘नाइकेटर या ‘विजेता’ की उपाधि धारण की) ईसा से 312 वर्ष पूर्व प्रधान बन गया। उसका राज्य सीरिया से बैक्ट्रिया तक विस्त हो गया। उसकी सिकन्दर के समान बनने की महत्त्वाकांक्षा थी, अतः उसने ईसा से 305 वर्ष पूर्व सिन्धु नदी को पाकर चन्द्रगुप्त का सामना किया।

यूनानी इतिहासकार इस युद्ध के परिणाम पर मौन हैं परन्तु सन्धि की शर्तों से यह ज्ञात होता है कि सेल्यूकस भारतीय सम्राट से युद्ध में हार गया था।

दोनों पक्षों के मध्य सन्धि की शर्ते निम्नलिखित थीं-

(i) दोनों पक्षों के मध्य वैवाहिक सम्बन्ध हुआ। ऐसा कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त से सेल्यूकस ने अपनी पुत्री का विवाह कर दिया।

(ii) सेल्यूकस ने अपने राज्य के 4 प्रान्त चन्द्रगुप्त को दे दिये। इन प्रान्तों के नाम कान्धार, काबुल, हेरात मेंबिलोचिस्तान थे।

(iii) चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 हाथी उपहारस्वरूप दिये।

(iv) इसके अतिरिक्त भारतीय सम्राट् के दरबार में सेल्यूकस का राजदूत मेगस्थनीज रहने लगा। उसने ‘इण्डिका’ :
की एक पुस्तक लिखी, जिसमें तत्कालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक व्यवस्था का किया गया था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का अन्तिम संघर्ष सिकन्दर के सेनापति सेल्यूकस के साथ हुआ । यूनानी और भारतीय सेना में घमासान युद्ध हुआ जिसमें चन्द्रगुप्त की विजय हुई । अपनी पराजय मानकर सेल्यूकस को चन्द्रगुप्त से सन्धि करनी पड़ी । सन्धि को सुदृढ़ बनाने के लिए सेल्यूकस ने अपनी पुत्री का विवाह भी चन्द्रगुप्त मौर्य से कर दिया और मेगस्थनीज नामक एक राजदूत भी चन्द्रगुप्त के दरबार में भेजा ।

चन्द्रगुप्त ने भी सेल्यूकस को 500 हाथी उपहार स्वरूप दिए । इस प्रकार चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य पश्चिम में मध्य एशिया से पूर्व में बंगाल तक और उत्तर में हिमालय पर्वत दक्षिण में कृष्णा नदी तक फैल गया । चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने बाहुबल और अदम्य साहस से भारत राजनीतिक एकता स्थापित की ।

चंद्रगुप्त मौर्य का शासन

चन्द्रगुप्त मौर्य (Chandragupt Maurya) के विशाल साम्राज्य का शासन प्रबंध अत्यंत संगठित था । उन्होंने जिस शासन प्रणा को अपनाया वह भारत के भावी शासकों के लिए आदर्श बन गई । शासन व्यवस्था मुख्यतः तीन भाग विभक्त थी प्रान्तीय शासन और स्थानीय शासन केन्द्रीय शासन । शासन की सर्वोच्च शक्ति सम्राट के पदाधिकारियों की व्यवस्था थी ।

शासन विभिन्न विभागों द्वारा चलाया जाता था । प्रत्येक विभाग के प्रम में थी लेकिन प्रजा का अधिक से अधिक कल्याण करने के उद्देश्य से मन्त्रियों, परामर्शदाताओं तथा अना रोगियों की चिकित्सा के लिए अनेक औषधालय खुले थे । भोजन सामग्री की शुद्धता की जाँच हेतु अधिकारी थे । शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार हेतु उसने शिक्षालयों की स्थापना की । आन्तरिक शान्ति एवं व्यवस्था के लिए पुलिस का प्रबंध था ।

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 चन्द्रगुप्त मौर्य अपनी प्रजा की उन्नति के प्रति सदैव प्रयत्नशील रहते थे । उन्होंने यातायात की समुचित व्यवस्था की । सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाये, कुएँ तथा धर्मशालाएँ बनवायीं ।

  यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक “ इण्डिका ” में चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र पड़ा विशद् वर्णन किया है । इस काल में भारत का बहुमुखी विकास हुआ । कृषि, व्यापार एवं ललित कला आदि के सम्यक् विकास हेतु शासन द्वारा अनेक सुविधाएँ दी जाती थी । उस समय प्रजा की नैतिक उच्चकोटि की थी । उस काल की शासन व्यवस्था वस्तुतः एक आदर्श थी ।

चन्द्रगुप्त मौर्य की मृत्यु(Death of Chandragupt Maurya )

लगभग 24 वर्ष राज्य का संचालन करने के पश्चात् सम्राट चन्द्रगुप्त ने अपने पुत्र बिन्दुसार को शासन का कार्यभार सौंप दिया और जैन धर्म संतों के साथ दक्षिण भारत गए। वहां उन्होंने संन्यास लिया। कुछ वर्ष साधक के रूप में जीवन व्यतीत करने हेतु जैन मुनि भद्रवाहु के साथ चन्द्रगिरि पर्वत पर में 298 ई 0 पू 0 में उनका निधन हो गया ।

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चन्द्रगुप्त मौर्य प्रमुख तथ्य (Chandragupt Maurya important fact )

चौथी या आठवीं शताब्दी में, विशाखदत्त ने चन्द्रगुप्त मौर्य पर मुद्राराक्षस नामक एक संस्कृत नाटक लिखा।
1911 में, बंगाली नाटककार द्विजेंद्रलाल रॉय ने चंद्रगुप्त नामक एक बंगाली नाटक लिखा।

एक तेलुगु फिल्म  चाणक्य चंद्रगुप्त , 1986 में बनाई गई थी , जिसमें नंदमुरी ने रामा राव को चंद्रगुप्त मौर्य के रूप में अभिनय किया था।

दिनेश शकुल और अभिषेक द्विवेदी ने 1991 में बनी चाणक्य नामक एक टेलीविजन श्रृंखला में चंद्रगुप्त मौर्य की भूमिका निभाई।
2001 में भारतीय डाक विभाग ने चंद्रगुप्त मौर्य के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया ।

उमेश मेहरा ने 2001 की हिंदी फिल्म अशोक में चंद्रगुप्त मौर्य की भूमिका निभाई।

F.A.Q

चंद्रगुप्त की पत्नी (chandragupta maurya wives) का नाम क्या था ?

चंद्रगुप्त की प्रथम पत्नी का नाम दुर्धरा था और दुसरी पत्नी का हेलेना था जो सेलुकस निकेटर की पुत्री थी सेलुकस निकेटर ने अपनी बेटी की शादी युद्ध संधि के तहत चन्द्रगुप्त मौर्य से कर दी थी

चंद्रगुप्त मौर्य के पिता का नाम क्या था ?

मुद्राराक्षस के अनुसार उन्हें नंद के वंशज के रूप में वर्णित किया गया है। नदराज की रानी की मुरा नाम की एक दासी थी। एक बार, नदराज युवती मुरा की सुंदरता पर मोहित हो गए

चंद्रगुप्त मौर्य की मृत्यु कब हुई ?

चंद्रगुप्त मौर्य की मृत्युचन्द्रगिरि पर्वत पर 298 ई 0 पू 0 में संलेखना से हुई थी

चंद्रगुप्त मौर्य कहां के रहने वाले थे ?

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार नेपाल के तराई में पिपलीवन नामक स्थान था।

चन्द्र गुप्त मौर्य ने कौन सा धर्म अपनाया ?

जैन जनश्रुति के अनुसार जैन मुनि भद्रवाहु से जैन धर्म की दीक्षा ली थी।

मौर्य वंश का संस्थापक कौन था ?

मौर्य वंश का संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य (Chandragupt Maurya) था।

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