महावीर स्वामी का जीवन परिचय Mahavir Swami Biography in Hindi

महावीर स्वामी

महावीर स्वामी का जीवन परिचय  Mahavir Swami Biography in Hindi

महावीर स्वामी का जीवन परिचय इन हिंदी (mahavir swami history in hindi) छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक भारत के सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में नाना प्रकार की बुराइयाँ उत्पन्न हो गयी थीं । भारतीय समाज में ऊँच – नीच की भावनाओं का बोलबाला था ।

समाज वर्णों, जातियों और उपजातियों में विभक्त हो गया था जिससे सामाजिक जीवन में पारस्परिक भेद – भाव बढ़ता जा रहा था । समाज में नाना प्रकार के धार्मिक अन्धविश्वास और कुरीतियाँ प्रचलित थीं ।

प्रचलित कर्मकाण्ड तथा जातिवाद की जकड़ के प्रति लोगों के मन में पर्याप्त असन्तोष था । जन साधारण ऐसे वातावरण की घुटन से छुटकारा पाने के लिए बेचैन था । इस समस्या को उस समय के कुछ युग – पुरुषों ने समझा और अपना सुधारवादी मत लोगों के सामने रखा । इन महापुरुषों की ओर जनसमुदाय आकर्षित हुआ ।

कुछ समय में इन मतों ने धार्मिक आन्दोलन का रूप ले लिया । इन्हीं मतों में से एक था – जैन मत । महावीर स्वामी अपने समय में जैन मत के सर्वश्रेष्ठ प्रचार और प्रवर्तक थे ।

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भगवान महावीर का जन्म (mahavir swami ka janm)

चंपारण, मुजफ्फरपुर, दरभंगा और सारण अब बिहार राज्य में हैं। दो हजार पांच सौ साल पहले इस क्षेत्र को लिच्छवियों की भूमि या ‘वज्जियो’ देश या लिच्छवियों की भूमि कहा जाता था। लिच्छवि एक गणतंत्र राज्य था। इसकी राजधानी वैशाली थी।

महावीर स्वामी का जन्म ईसा से 599 वर्ष पूर्व वैशाली (उत्तर बिहार) के अंतर्गत कुण्डग्राम में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था। महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था। उनके पिता का नाम सिद्धार्थ था। महावीर की माता का नाम त्रिशला था। महावीर स्वामी के भाई का नाम नंदिवर्धन और बहन का नाम सुदर्शना था।  वे बचपन से ही बहुत गंभीर थे।

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विभिन्न सांसारिक सुखों का होना। वर्धमान बचपन से ही बुद्धिमान, गुणी और विचारशील थे। युवा वर्धमान हमेशा जीवन-मृत्यु, कर्म, संयम आदि विषयों पर विचार-विमर्श करते रहते थे।

वर्धमान का मन भी उनकी आत्मा में बेचैन रहता था। दिखावटीपन, समाज में ऊँच-नीच की भावना, चरित्र का ह्रास और जानवरों की हत्या उनके दर्द के मुख्य कारण थे। यज्ञ के नाम पर पशुओं को मारना वर्धमान के लिए असहनीय था।

महावीर स्वामी का जीवन परिचय मुख्य बिंदु

नाम  Name वर्धमान

पुरा नाम Full Name

जन्म तारीख Date of Birth 599 B.C

जन्म स्थान Place of Birth वैशाली के अंतर्गत कुण्डग्राम

मृत्यु Death पावापुरी

पारिवारिक जानकारी Family Information

पिता का नाम Father’s Name सिद्धार्थ

माता का नाम Mother’s Name त्रिशला

भाई का नाम नंदीवर्धन

बहन का नाम सुदर्शना

पत्नी  का नाम  यशोदा

पुत्री का नाम प्रियदर्शिनी

दामाद का नाम जामालि

अन्य जानकारी Other Information

सम्मान जैन धर्म के चौंबीसवें तीर्थंकर

महावीर स्वामी का विवाह

महावीर स्वामी का विवाह यशोदा के साथ के साथ हुआ था इनकी एक पुत्री भी थी जिसका नाम प्रियदरशनी था।

महावीर स्वामी का वैराग्य

 अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद, वर्धमान ने सांसारिक मोहों को त्याग दिया और अपने पूर्वज नंदीवर्धन के कहने पर सन्यास ले लिया। इस समय उनकी आयु 30 वर्ष थी। वह सत्य और शांति की खोज में निकल पड़ा। इसके लिए उन्होंने तपस्या का रास्ता अपनाया। उनका मत था कि कठोर तपस्या से ही मन में छिपे काम, क्रोध, लोभ, पागलपन और भ्रम को समाप्त किया जा सकता है।

12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। कठोर तपस्या और इंद्रियों के नियंत्रण की कठिनाइयों को सफलतापूर्वक सहन करने के कारण उन्हें “महावीर” या “जिन” के रूप में जाना जाने लगा। उन्होंने जिस धर्म का प्रचार किया वह “जैन धर्म” के नाम से जाना जाता है।

 जैनों की मान्यता के अनुसार महावीर से पहले जैन धर्म में 23 तीर्थंकर हो चुके हैं। महावीर इन  तीर्थंकरों में अंतिम थे। तीर्थंकर नाम का अर्थ “दुख पर विजय पाने का पवित्र मार्ग दिखाने वाला” होता है। ज्ञान के स्वामी महावीर स्वामी 30 वर्षों तक बड़े उत्साह के साथ अपने धर्म का प्रचार करते रहे। वह साल में आठ महीने बिताते थे और आम जनता के बीच अपनी राय का प्रचार करते थे और साल के चार महीने शहर में करते थे। धीरे-धीरे जैन धर्म भारत के सभी राज्यों में फैल गया।

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 जैन धर्म के ” त्रिरत्न ” यह हैं- सम्यक् दर्शन ( सही बात पर विश्वास ), सम्यक् ज्ञान तथा सम्यक् चरित्र ( उचित कर्म )

 महावीर स्वामी के उपदेशों, उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों, विधानों का जन – मानस प अन्तिम क्षण तक जन – जन को दीक्षित करते रहे ।

 उनके समय में उत्तरी भारत में तो इस धर्म के प्रचार – प्रसार हेतु कई केन्द्रों की भी हो गई थी । सामान्यजनों के अतिरिक्त बिम्बसार तथा उसके पुत्र अजातशत्रु जैसे राजा भी महावीर के उपेदशों से प्रभावित हुए ।

 महावीर स्वामी के उपदेश हमें जीवों पर दया करने की शिक्षा देते हैं । उन्होंने मानव समाज सा मार्ग बताया जो सत्य और अहिंसा पर आधारित है और जिस पर चलकर मनुष्य आज भी हि जो कष्ट दिये हुए मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है ।

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महावीर स्वामी की शिक्षा

महावीर ने धर्म की शिक्षा दी। उन्होंने शिष्यों के एक समूह बनाया । महावीर के मुख्य सिद्धांत मे पांच व्रत हैं।  परिवारों के लिए  बहुत छोटे पैमाने के नियम हैं। इसलिए इन्हें अणुव्रत  कहा जाता है। सन्यासी के लिए बड़े पैमाने के नियम हैं महाव्रत कहा जाता हैं।

महावीर स्वामी

पांच व्रत का नाम अहिंसा, अस्तेय, असत्य का त्याग, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य हैं।

अहिंसा का अर्थ है किसी भी जीव को हानि नहीं पहुँचाना दर्द पैदा करने के विचार से भी बचना।

अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना, दूसरे की संपत्ति की इच्छा न करना ।

अपरिग्रह का अर्थ है जितना आवश्यक हो उतना ही रखना।

ब्रह्मचर्य का अर्थ शुद्धता  यौन गतिविधियों में भोग को नियंत्रित करने के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास।

महावीर ने समाज को चार समूहों में संगठित किया: संन्यासी, संन्यासिनी, गृहस्थ (विवाहित पुरुष), गृहिणी (विवाहित महिला)। इसे चतुर्वर्ण संघ कहा जाता है।

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महावीर ने सभी मनुष्यों को मोक्ष का मार्ग दिखाया।

भगवान महावीर के जन्म महावीर जयंती के रूप में मनाया जाता है

महावीर स्वामी की मृत्यु

महावीर ने 32 वर्षों तक धर्म का प्रचार किया । 72 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी पाटलिपुत्र ( पटना ) के निकट पावापुरी में जाकर ध्यान लगाए थे और यहीं उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ ।

527 ईसा पूर्व पावापुरी में कार्तिकेय के महीने में मोक्ष प्राप्त किया था उस समय वे 71 वर्ष 3 महीने 25 दिन के थे। वह दिन दीपावली  का दिन था। जैन लोग दीपावली पर्व को महावीर की मुक्ति के दिन के रूप में बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं।

भगवान महावीर स्वामी (bhagwan mahavir swami) विशेष तथ्य

भगवान महावीर स्वामी के जन्म महावीर जयंती के रूप में मनाया जाता है

जैन धर्म के अनुसार महावीर के कुल 11 गणधर थे जिनका नाम

इंद्रभूति गौतम
अग्निभूमि गौतम
वायुभूमि गौतम
मंडिकपुत्र वशिष्ठ मौर्य
व्यक्त भारद्वाज कोल्लक
सुधर्मण अग्निवेश्यायन कोल्लक
भौमपुत्र कासव मौर्य
अकंपित गौतम
अचलभ्राता हिभाण
मेतार्य कौंडिन्य तुंगिक
प्रभास कौंडिन्य।

भगवान महावीर की मृत्यु के दो सौ साल बाद जैन धर्म श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों में विभाजित हो गया था।

दिगम्बर सम्प्रदाय दिगम्बर का अर्थ जो दिशाओ को अपना वस्त्र मानते है और नग्न रहते है

श्वेतांबर सम्प्रदाय श्वेतांबर जो श्वेत वस्त्र पहनते है

महावीर स्वामी के उपदेश की भाषा मागधी या अर्धमागधी थी 

जिओं और जीने दो के सिद्धान्त महावीर स्वामी ने ही दिया

महावीर स्वामी के नाना का नाम क्या था

महावीर स्वामी के नाना का नाम राजा चेटक था।  राजा चेटक की पुत्रिया का नाम क्रमश: प्रियकारिणी, मृगावती, सुप्रभा, प्रभावती, चेलिनी, ज्येष्ठा और चन्दना था इनकी माता त्रिशाला का नाम प्रियकारिणी भी था।

महावीर स्वामी के बचपन का नाम क्या था

महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्धमान था।

महावीर स्वामी का जन्म कब हुआ था ?

महावीर स्वामी का जन्म ईसा से 599 वर्ष पूर्व वैशाली (उत्तर बिहार) के अंतर्गत कुण्डग्राम में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था।

महावीर स्वामी के गुरु का नाम क्या था

महावीर स्वामी के कोई गुरु नहीं थे उन्होंने 12 वर्ष के कठोर तप के बाद ज्ञान की प्राप्ति हुई थी ऋजुपालिका नदी के तट पर एक साल्वा वृक्ष के नीचे प्राप्त सच्चा ज्ञान की प्राप्ति हुई थी

महावीर स्वामी का प्रथम उपदेश कहा दिया 

महावीर स्वामी ने अपना पहला उपदेश वराकर नदी के तट पर राजगृह के पास विपुलांचल पहाड़ी पर दिया था। जमाली उनके पहले शिष्य थे। चंपा के शासक, दधिवाहन की बेटी ‘चंदना’ उनके पहले शिष्या थी ।

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