ह्वेनसांग की भारत यात्रा | hiuen tsang chinese traveller in Hindi

ह्वेनसांग
ह्वेनसांग

ह्वेनसांग की भारत यात्रा  hiuen tsang chinese traveller in Hindi

 ह्वेनसांग ने हर्षवर्धन के समय में भारत की यात्रा की थी । चीनी यात्री ह्वेनसांग अथवा य्वान च्वांग अथवा ह्वेन त्सांग चीनी बौद्धों में सबसे प्रसिद्ध है,गोबी तथा खोतान के रेगिस्तान से होता हुआ वह अफगानिस्तान पहुँचा  620 ई ० में भारत में प्रविष्ट हुआ । ह्वेनसांग यहाँ 14 वर्ष ठहरने तथा सभी महत्त्वपूर्ण स्थानों को देखने के पश्चात् वह भारत से 644 ईसवी में चल गया फाह्यान की तरह केवल ह्वेनसांग बौद्ध धर्म ही में नहीं, वरन् अन्य बातों में भी वह भाग लेता था और राजसभाओं में भी गया

सी यू की ‘ नामक पुस्तक में, विवरण दिये हुए हैं पुस्तक में अनेक स्थानों एवं खण्डहरों का वर्णन है और भारतीयों की सामाजिक तथा राजनीतिक अवस्था का साबस्तार उल्लेख है ह्वेनसांग अनेक उपहारो तथा उपाधियों से विभूषित होकर वह 645 ई ० में स्वदेश पहुंचा । 645 ई ० में वह मर गया, परन्तु अपनी ज्ञान तथा धार्मिक आस्था के लिए वह प्रसिद्ध है

 ह्वेनसांग की भारत यात्रा का विवरण

राजनीतिक दशा

ह्वेनसांग ने हर्षवर्धन के विसय में लिखा है। 6 वर्ष के युद्ध के पश्चात् उसने भारत विजय की ।  1,00,000 घुड़सवार थे । तीस वर्ष के पश्चात् उसने विश्राम ग्रहण किया तथा हर साम्राज्य का विस्तार कर उसने सेना भी बदायी । उसके पास 60,000 युद्ध के हाथी थे हर स्थान पर उसका शासन शान्तिमय हो गया । इसके पश्चात् उसने मृदु व्यवहार करने का  भरसक प्रयास किया तथा देश – भर में धार्मिक वृत्ति को अंकुरित करने में इतना व्यस्त हो गया कि उसे खाने तथा साने तक की सुध न रहती ।

उसने देश भर में पशु – हत्या और मांस – भक्षण बन्द करवा दिया तथा इस अपराध को अक्षम्य घोषित किया, जिसकी सजा प्राणदण्ड थी । उसने गंगा नदी के किनारे सहसों स्तुप बनवाये जो 100 फीट ऊंचे थे तथा वहाँ पर वैद्य सभी यात्रियों तथा गरीबों को ओषधि बाँटते थे । थे और नगर – ग्राम के सभी राजमार्गों पर उसने चिकित्सालय खुलवाये, जिनमें पथ्य और भोजन मिलता था । यदि किसी नगर के निवासियों के आचरण में कुछ परिवर्तन दिखायी पड़ता तो वह राज्य – कार्य देखता, दूसरे भाग में धार्मिक कार्यों में संलग्न रहता

  यह भी जानता था । उसका प्रत्येक दिन दो – तीन भागों में बँटा हुआ था – प्रथम भाग में कोई बाधा नहीं आने दे सकता था । इस तरह उसका दिन कभी लम्बा न जान पड़ता था ।

 इन बातों से ज्ञात होता है कि हर्ष बहुत ही विचारशील शासक था, जिसकी भावनाएँ बहुत ही महान् थीं ।

 ह्वेनसांग भारतीयों तथा उनके चरित्र के विषय में अच्छी धारणा लेकर गया । भारत के लोगों के विषय में वह कहता

 ” यद्यपि वे विशेष गम्भीर नहीं, फिर भी सच्चे और ईमानदार हैं । वे धन के मामलों में किसी से छल – प्रपंच नहीं करते और व्यवहार में भी निश्छल तथा निष्कपट हैं । उनके शासन के नियमों में भी बड़ी सच्चाई है । उनका व्यवहार अत्यन्त मधुर एवं मृदुल है ।

‘ न्याय – व्यवस्था – जब नियम तोड़े जाते हैं तो उसका अर्थ होता है शासक की शक्ति को न मानना । अतः इन नियमों के उल्लंघन की ठीक – ठीक खोज करने के पश्चात् अपराधियों को कारावास का दण्ड दिया जाता है और कोई शारीरिक दण्ड नहीं दिया जाता । अपराधियों को केवल मरने के लिए छोड़ दिया जाता है तथा उनकी गणना मनुष्यों में नहीं होती ।

ह्वेनसांग की भारत यात्रा वृतांत

ह्वेनसांग की भारत यात्रा वृतांत में लिखा है जब कोई सम्पत्ति अथवा न्याय के नियमों को भंग करता है या जब कोई विश्वासघात करता या पिता के प्रति कर्त्तव्य से च्युत होता है, तो उसके नाक या कान काट लिए जाते हैं या हाथ और पैर काटकर उसको देश से निकालकर अन्य प्रदेशों तथा रेगिस्तान में डाल दिया जाता है । इन अपराधों के अतिरिक्त अन्य छोटे अपराधों पर केवल थोड़ा – सा जुर्माना दे देने से आदमी दण्ड से बच जाता है । इसके आगे ह्वेनसांग उल्लेख करता है कि अपराधी द्वारा अपराध स्वीकार कराने के लिए जल, अग्नि, मार तथा विष की चार परीक्षाएँ होती हैं ।

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 शासन – चूँकि शासन – व्यवस्था उच्च आदर्शों द्वारा अनुप्राणित है, अतः उसके सम्पादन में कठिनाई नहीं पड़ती । रजिस्टर में कुटुम्बों के नाम नहीं दर्ज किये जाते और न लोगों से बेगार ही ली जाती है । लोगों पर कर भी हलके हैं तथा उनसे जो वैयक्तिक कार्य लिया जाता है, वह भी साधारण सा है ।

 आर्थिक दशा – जो राजभूमि जोतते हैं उन्हें अपनी उपज का छठा भाग भूमि – कर के रूप में देना पड़ता है । जो लोग वाणिज्य तथा व्यापार करते हैं, वे उसके लिए इधर – उधर आया – जाया करते हैं । नदी के पुलों तथा सड़क के फाटकों प योड़ी – सी चुंगी देनी पड़ती है । सोने या चाँदी के सिक्कों के न होने के कारण आपस में केवल वस्तुओं के आदान – प्रदान पर व्यापार चलता था

 भारत की जातिया

  कुल चार वर्ग हैं । प्रथम में तो पवित्र आचारवाले ब्राहद देश – विदेश में पुमते हैं । चौधा है कृषक वर्ग जो शूद्र कहलाता है । ये खेत जोतते – बोते हैं । एक बार विवाह करते हैं । तीसरा व्यापारियों का वर्ग वैश्य जाति के नाम से पुकारा जाता है । ये वाणिज्य – व्यापार करते तथा

 नगर व घर

नगर एवं ग्रामों के अन्दर फाटक होते हैं । दीवारें चौड़ी और ऊँची होती हैं । गलियाँ और । सफाई करनेवाले मेहतर इत्यादि शहर के बाहर रहते हैं । आने – जाने में इनको अपने बायें चलने की आज्ञ एवं रेजी – मेड़ी हैं । राजमार्ग गन्दे हैं । उनके दोनों ओर उचित चिह्नों से युक्त दुकानें हैं । कसाई, मछुए, नतर कि वे अपने घर न पहुंच जाय । घरों की दीवारें कच्ची मिट्टी या चूने से ढकी रहती हैं

 भाषा – मध्यदेश में भाषा का वही प्राचीन तथा आदिम रूप अभी तक बना हुआ है । यहाँ पर देववाणी की । का उच्चारण कोमल तथा मधुर है । शब्दों का उच्चारण स्पष्ट तथा शुद्ध है और सब लोगों के लिए आदर्श नालन्दा ( राजगिरि के पास बड़ा गाँव ) का विहार था । अनेक परम्परागत सम्राटों के संरक्षण में यह संस्था बन नालन्दा विश्वविद्यालय – यद्यपि देश भर में अनेक शिक्षा संस्थाएँ थीं, परन्तु इस युग का सबसे ह्वेनसांग यहाँ रहा और बहुत दिनों तक अध्ययन करता रहा । वह नालन्दा के जीवन का निम्नलिखित शब्द

 ” यहाँ अत्यन्त उच्चकोटि की प्रतिभा तथा योग्यतावाले कई सहस्त्र भिक्षु है । इस समय उनकी योग्यता चार पर पहुंच चुकी है । अनेक ऐसे हैं जिनका यश सुदूर देशों में फैल चुका है । उनका चरित्र पवित्र तथा अदूषित है ।३ ।। नियमों का बहुत ही तत्परता से अनुसरण करते हैं । विहार के नियम बहुत ही कड़े हैं तथा सभी भिक्षुओं के उत्तर देने के लिए दिन पर्याप्त नहीं होता । सुबह से रात्रि तक वे वाद – विवाद में व्यस्त रहते हैं तथा छोटे – बड़े

 इसके पोषण के लिए सौ ग्राम लगे हुए थे । इस काल के सबसे प्रसिद्ध बौद्ध पण्डित गुणमति, स्थिर जिनमित्र तथा शीलभद्र इत्यादि थे, जो इस विश्वविद्यालय के अध्यापक थे । इस विहार में लगभग सो व्याण्डका अवसर पर होनेवाले आमोद – प्रमोद हमें दरबारी जीवन के सुखमय पहलू का आभास देते हैं । उनका लोगों के नीचे तथा ऊपर पहनने के कपड़े दर्जी के सिले हुए नहीं होते थे, किन्तु अजन्ता की एक हुए कपड़ो का नमूना मिलता है । श्वेत रंग के वस्त्र अधिक । लिपी रहती हैं । करता है की सहायता करते हैं । ” थे । व्याख्यान – स्थान में विद्यार्थी अवश्य उपस्थित रहते थे । लगभग 1,000 अध्यापक थे । भिक्षु विद्यार्थियों की सी सहस्र थी । वे दूर – दूर देशों से आते थे । ह्वेनसांग यहाँ 5 वर्ष ठहरा था । शीलभद्र नालन्दा विहार का अध्यक्ष का इतने संयत तथा गौरवयुक्त थे कि इस संस्था के स्थापित होने के 700 वर्ष बाद तक कोई नियम का उल्लंघन अनुशासन भंग नहीं हुआ । राज्य की ओर से 100 गाँव लगे हुए थे । इसके अतिरिक्त गृहस्थ भी कई सहस्र पिकर ( 1 पिकुल = 133 पौण्ड ) तथा कई सौ कट्टी ( 1 कट्टी = 160 पौण्ड ) दूध तथा मक्खन देते थे । विद्यार्थी सुख से रहते थे ।

 शिक्षा का स्तर ऊँचा था । शास्त्रार्थ की धूम रहती थी । चीनी यात्री लिखता है कि लगभग 100 शास्त्रार्थ होते थे

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 । ब्राह्मण धर्म तथा बौद्ध धर्म दोनों के ग्रन्थों का अध्ययन होता था । बहुत से विद्वान् पढ़ने आते थे । नालय भी विद्वान् विदेशों में अपनी विद्या का प्रचार करने जाते थे । उन्होंने चीन और तिब्बत की भाषा में बहुत से संस्कृत का अनुवाद किया । ह्वेनसांग के विस्तृत वर्णन से हमें नालन्दा विहार के बारे में बहुत – कुछ ज्ञान प्राप्त होता है ।

 बाण के लेखानुसार विन्ध्याचल पर्वत के वन में दिवाकर मित्र का आश्रम था जहाँ ब्राह्मण धर्म – ग्रन्थों का अध्ययन होता था । यहाँ भी सब धर्मों के लोग आते थे और शास्त्रार्थ में भाग लेते थे ।

 सामाजिक जीवन

 वेशभूषा, आभूषण – समाज का जीवन सुखमय तथा आमोदपूर्ण था । कमर के चारों ओर लोग बगल तक एक लम्बा कम चौड़ा कपड़ा लपेटते है

 डीला – ढाला होता और नीचे तक लटकता रहता था । स्वयं सम्राटों के पहनने के भी दो ही कपड़े होते थे । एक धोती जो कंधे तक लपेटी जाती थी  और दूसरा वस्त्र उत्तरीय था । राजा लोग सिर पर श्वेत फूलों की माला धारणा करते थे । कुलीन लोगों के सिर पर छाते से छाया की जाती थी । इन छातो पर बहुमूल्य पत्थर जड़े रहते थे जन – साधारण का पहनावा सादा था, परन्तु आभूषणों का प्रयोग होता था । वाण ने अनेक बारह का आभूषण पहन हुए वर्णित किया है ।

 राजाओं तथा सम्प्रान्त पुरुषों के सिर के आभूषण बहुमूल्य मुकुट थे । उनके तन को अंगठी, कड़े, हार सुशोभित होते थे

 खान – पान – हुवेनसांग लिखता है कि प्रत्येक समय भोजन करने के पूर्व भारतीय अपने हाथ, पैर, मैंह को धोते

 थे । उच्छिष्ट और बची – खुची चीज फिर नहीं परोसी जाती थी । जो बर्तन मिट्टी अथवा काठ के होते थे, उनका केवल एक ही बार प्रयोग होता था । सोना, ताँबा, लोहा आदि धातुओं के बर्तन स्वच्छ कर लिए जाते थे । भारत में पवित्र तथा अपवित्र भोजन के बीच जो भेद किया जाता था, उसका उल्लेख इत्सिग भी करता है ।

 ब्राह्मण मदिरा नहीं पीते थे । क्षत्रिय लोग पीते थे, क्योंकि हर्ष के जन्मोत्सव पर सुरा – पान की धूम थी ।

 ह्वेनसांग लिखता है कि क्षत्रिय लोग ईख तथा अंगूर से तैयार की हुई मदिरा पीते थे । बौद्ध भिक्षु तथा ब्राह्मण केवल अगर तथा इख का सरबत पीते थे । हर्ष के समय में मांस – भक्षण की प्रथा प्रचलित थी । भोजन की साधारण वस्तुओं में घी, दूध, दही, मिसरी, रोटी का उल्लेख है । जन – साधारण गेहूँ और चावल खाते थे । देश में फल प्रचुर मात्रा में पैदा होते थे ।

 ” प्याज और लहसुन बहुत कम पैदा किया जाता है तथा बहुत कम आदमी इन्हें खाते हैं । यदि कोई आदमी इन्हें खाता है तो नगर की सीमा के बाहर निकाल दिया जाता है । दूध, मक्खन, मलाई, मुलायम शक्कर तथा मिसरी, मरसों का तेल और हर प्रकार के अन्न की रोटियां भी साधारणतया सर्वसाधारणका भोजन है । मछली, बकरा, हिरन तथा छोटे मृगों इत्यादि का मांस ताजा ही खाया जाता है तथा कभी उनमें नमक भी डाल लिया जाता है

 स्त्रियों की स्थिति – बाण के अन्य से पता चलता है कि सन्तान की इच्छा से स्त्रियाँ अनेक प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान करती थीं । राजा के पुत्र – जन्म होने पर बन्दी मुक्त कर दिये जाते थे । नवजात शिशु को आशीर्वाद देने के लिए स्त्रियाँ आती थीं । हर्ष के जन्म के समय वे नाना प्रकार की मणियों से जड़े हुए हाथी – दाँत के पात्रों में कुंकुम, फूलमाला, सुपारी तथा सिन्दूर आदि अपने साथ लाती थीं । पुत्र के जन्मोत्सव पर गाना – बजाना होता था । रोग – दोष से बचने के लिए बालकों को तरह – तरह के ताबीज पहनाये जाते थे ।

 विवाह का उत्सव धूमधाम से होता था । राज्यश्री के विवाह के समय महल में चारों ओर आनन्द – ही – आनन्द दिखायी देता था । विवाह के लिए बारात के साथ वर स्वयं हाथी पर बैठकर कन्या के घर आता था । विवाह समुचित लग्न पर होता था, जिसका टलना आपत्तिजनक समझा जाता था । विवाह अग्नि के सामने वेदी पर ब्राह्मणों को साक्षी मानकर किया जाता था । व्रतों तथा उत्सवों की भी धूम थी । शुभ अवसरों पर अनेक प्रकार के मांगलिक अनुष्ठान किये जाते थे । शतरंज और चौसर के खेल लोकप्रिय थे । राजपुत्र शारीरिक व्यायाम में निपुण होते थे । गाँवों में जादूगर अपने कौतुक दिखाते थे ।

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 स्त्रियों का जीवन आनन्दमय था । भद्र घरों की महिलाओं में शिक्षा का यथेष्ट प्रचार था । राज्यश्री कुशल स्त्रियों तथा सखियों के साथ रहकर नृत्य, संगीत आदि नाना प्रकार की कलाओं में प्रवीण हो गयी थीं । वह बौद्धदर्शन में इतनी पारंगत थी कि ह्वेनसांग के व्याख्यानों को समझ लेती थी । स्त्रियाँ चित्रकला में भी निपुण होती थीं । बाल विवाह का भी प्रचार था । राज्यश्री विवाह के समय 11 वर्ष की थी । माता के साथ बड़े प्रेम तथा श्रद्धा का व्यवहार किया जाता था । स्त्रियाँ वैधव्य को अपने दुर्भाग्य की पराकाष्ठा समझती थीं । ऐसा जान पड़ता है कि पर्दे की प्रथा उच्च जातियों में प्रचलित थी । राजाओं के अन्तःपुर में कड़ा पहरा रहता था ।

 धार्मिक अवस्था देश में भिन्न – भिन्न प्रकार के धर्म तथा सम्प्रदाय प्रचलित थे । दार्शनिक सिद्धान्तों का ज्ञान प्राप्त करने को अधिक महत्त्व दिया जाता था । देश में अन्धविश्वास की अभिवृद्धि थी । असहिष्णुता का भाव भी फैल रहा था ।

हिन्दू धर्म – हिन्दू धर्म में बहुत – से सम्प्रदाय बन गये थे । इन सब में शैव सम्प्रदाय सबसे अधिक प्रबल था ।

 थानेश्वर में शिव की पूजा घर – घर में होती थी, परन्तु विष्णु की उपासना भी कम न थी । वैष्णव धर्म का प्रचार था । सूर्य की भी पूजा होती थी । इन देवताओं के अतिरिक्त और भी बहुत – से देवी – देवताओं की पूजा होती थी । उनमें  चण्डिका, दुर्गा के नाम उल्लेखनीय हैं । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य यज्ञे भी करते थे । देश में तीके लिए हजारों आदमी आते थे देश मे तेर्थ स्थान बहुत थे हजारों आदमी इनके दर्शनार्थ जाते थे । हर्ष प्रति पाँचवें वर्ष प्रयाग जाता था । प्रयाग तथा हरिद्वार गंगा स्नान करने के लिए हज़ारो आदमी आते थे

ह्वेनसांग के लेखानुसार कान्यकुब्ज में विष्णु, शिव तथा सूर्य के मन्दिर थे । काशी  जिसमें कहा जाता है कि एक सहस्र यात्री प्रतिदिन दर्शन करते थे ।  कपिलवस्तु, बोधगया आदि स्थानों में भी मन्दिरों का अभाव न था ।

 बौद्ध धर्म – फाह्यान के समय से भी अधिक ह्वेनसांग के समय में बौद्ध धर्म की अवनति हो रही उत्तर पछिम में हणों के आक्रमणों के कारण विहार छिन्न – भिन्न हो चुके थे । दक्षिण में जैन धर्म का बोलबालाथा पूर्व में बौद्ध धर्म अवश्य प्रचलित था, परन्तु ह्वेनसांग लिखता है कि वहाँ भी अनेक मन्दिर थे ।

ह्वेनसांग को भारत में करीब 20 लाख भिक्षु मिले । बौद्ध धर्म की अवनति के समय इतन न इस बात का द्योतक है कि भारतीय नर – नारियों पर बोद्ध धर्म का प्रभाव काफी अधिक था ।

 जैन धर्म – जैन धर्म का प्रभाव उत्तर से दक्षिण की ओर खिसक रहा था । उसके माननेवालों की संख्या

 कम हो रही थी । वैशाली तथा समतट में इसका प्रभाव अधिक था । दक्षिण में भी इसका प्रभाव था पुलिकेसीन द्वितीय जैन धर्म का समर्थक है । जैन धर्म के दो सम्प्रदाय थे — ( 1 ) दिगम्बर और ( 2 ) श्वेताम्बर ।।

 ह्वेनसांग ने इस संस्था के सदस्यों से बहुत ही अनुराग रखा, अतः उसके जाने के बाद भी उसकी यादे बानी रही । चीन लौट जाने के अनेक वर्ष बाद नालन्दा के भिक्षुओं ने उसके लिए वस्त्र भेजे तथा लिखा उपासक वेदी पर जाकर तुम्हारे लिए निर्वाण की कामना करते हैं । अब हम सब तुम्हारे लिये श्वेत ताकि तुम्हें स्मरण रहे कि हम सब तुम्हें भूले नहीं हैं । चीन का मार्ग लम्बा है, अतः उपहार की तुच्छता पर ध्यान मत देना । आशा है, इसे स्वीकार करोगे ।

ह्वेनसांग भारत क्यों आया था ?

ह्वेनसांग भारतीय बौद्ध धर्म का अध्ययन करने के लिए भारत आए थे।

ह्वेनसांग भारत कब आया ?

चीनी यात्री ह्वेनसांग अथवा य्वान च्वांग अथवा ह्वेन त्सांग चीनी बौद्धों में सबसे प्रसिद्ध है,गोबी तथा खोतान के रेगिस्तान से होता हुआ वह अफगानिस्तान पहुँचा  620 ई ० में भारत में प्रविष्ट हुआ ।

ह्वेनसांग किसके शासनकाल में भारत आया ?

चीनी यात्री ह्वेनसांग अथवा य्वान च्वांग अथवा ह्वेन त्सांग ने हर्षवर्धन के समय में भारत की यात्रा की थी ।

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