रहीम दास का जीवन परिचय Rahim Das ka Jivan Parichay

Rahim Das ka Jivan Parichay

Rahim Das ka Jivan Parichay नमस्कार दोस्तों आज आप इस लेख में रहीम का जीवन परिचय के बारे में जानेगे साथ ही रहीम के जीवन के अन्य तथ्यों के बारे में जानेगे

रहीम दास का जीवन परिचय Rahim Das ka Jivan Parichay

जो गरीब सों हित करें, धनि रहीम ये लोग।

कहाँ सुदामा चापुरी, कृष्ण मिताई जोग ।।

जो लोग गरीबों का भला करते हैं वास्तव में ये ही धन्य हैं। कहाँ द्वारिका के राजा कृष्ण और कहाँ गरीब ब्राह्मण सुदामा। दोनों के बीच अमीरी-गरीबी का बहुत बड़ा अंतर था, फिर भी श्री कृष्ण ने सुदामा से मित्रता की और उसका निर्वाह किया।

उक्त पंक्तियों की रचना महान कवि रहीम ने की। रहीम ने कविताओं व दोहों में नीति और व्यवहार पर बल दिया और समाज को आदर्श मार्ग दिखाया। रहीम दास मुसलमान होते हुए भी भगवान श्री कृष्ण के  भक्त थे। उन्होंने काव्य के द्वारा जिस सामाजिक मर्यादा को प्रस्तुत किया वह आज भी अनुकरणीय है।

रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ानाँ (abdul rahim khan-i-khana) था। रहीम का जन्म लाहौर (जो अब पाकिस्तान में है) में 1556 ई0 में हुआ। इनके पिता बैरम खाँ हुमायूँ के अतिविश्वसनीय सरदारों में से एक थे। रहीम के जन्म के समय उनके पिता की उम्र 60 वर्ष की थी बैरम खान की दूसरी पत्नी का नाम सईदा खान था जो कि बाबर की पुत्री थी।

अकबर ने उनके पिता को खाने खाना की उपाधि दी थी जो उपाधि इनको बाद में प्रदान की गई थी।हुमायूँ की मृत्यु के बाद बैरम खाँ ने तेरह वर्षीय अकबर का राज्याभिषेक कर दिया तथा उनके संरक्षक बन गए। हज यात्रा के दौरान मुबारक लोहानी नामक एक अफगानी पठान ने बैरम खाँ की हत्या कर दी।

सरदार मुबारक खान ने पिता की मौत का बदला लेने के लिए यह सब किया।रहीम उस समय मात्र पाँच वर्ष के थे। सुल्ताना बेगम वहां से भाग निकली और अहमदाबाद आ गईं। जब अकबर को यह सब पता चला तो उसने सुल्ताना बेगम को आगरा जाने के लिए एक पत्र भेजा। सुल्ताना बेगम ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और वहां चली गईं। रहीम अपनी माँ के साथ अकबर के दरबार में पहुंचे।  रहीम अपनी माँ के साथ अकबर के दरबार में पहुंचे। अकबर ने सुल्ताना बेगम से शादी कर लीइस प्रकार अकबर ने रहीम को अपने पुत्र के रूप में पाला।

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रहीम का जीवन परिचय (rahim biography in hindi) एक नज़र में

नाम अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ानाँ (abdul rahim khan-i-khana)
 उपनाम रहीम दास 
माता का नाम सुल्ताना बेगम
पिता का नाम बैरम खां
व्यक्तिगत जीवन
जन्म की तारीख 17 दिसंबर 1556,
जन्मस्थान लाहौर, मुगल साम्राज्य
पत्नी का नाम माहबानो
 धर्म इस्लाम
 प्रतिभा
कवि, सेनापति, प्रशासक, शरणार्थी, दार्शनिक, राजनयिक, परोपकारी और विद्वान
 पद
अकबर के दरबार मीर अर्ज

रहीम की शिक्षा

अकबर ने रहीम के लालन-पालन की व्यवस्था राजकुमारों की तरह की। अकबर ने रहीम को ‘मिर्जा की उपाधि भी प्रदान की जो केवल राजकुमारों को दी जाती थी।

उन्होंने रहीम की शिक्षा के लिए मुल्ला अमीन को नियुक्त किया। रहीम ने मुल्ला अमीन से अरबी, फारसी, तुर्की, गणित, तर्कशास्त्र आदि का ज्ञान प्राप्त किया। अकबर ने रहीम के लिए संस्कृत अध्ययन की भी व्यवस्था की। बचपन से ही अकबर जैसे उदार व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त होने के कारण रहीम में उदारता और दानशीलता के गुण भर गए।

रहीम के गुरु का नाम मुल्लाह मोहम्मद अमीन था। मुल्लाह मोहम्मद अमीन से रहीम को तुर्की अरबी फारसी भाषा का ज्ञान प्राप्त हुआ। रहीम के संस्कृत भाषा के शिक्षक बदायूनी थे।

रहीम को काव्य सृजन का गुण पैतृक परम्परा से प्राप्त हुआ था। इसके अतिरिक्त उन्हें राज्य संचालन, वीरता और दूरदर्शिता भी पैतृक रूप में मिली। मिर्जा खाँ रहीम की कार्य कुशलता, लगन और योग्यता देखकर अकबर ने उन्हें शासक वंश से जोड़ने का निश्चय किया। अकबर ने रहीम का विवाह माहमअनगा की बेटी तथा खाने जहाँ अजीज कोका की बहन से करा दिया।

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सन् 1573 ई0 में मिर्जा खाँ रहीम का राजनीतिक जीवन आरंभ हुआ। अकबर गुजरात के विद्रोह को शान्त करने के लिए अपने कुछ विश्वसनीय सरदारों को लेकर गए थे। उनमें सत्रह वर्षीय मिर्जा खाँ भी थे।

1576 ई0 में अकबर ने उन्हें गुजरात का सूबेदार बनाया। 1580 तक मिर्जा खाँ ने राजा भगवानदास और कुँवर मानसिंह जैसे योग्य सेनापतियों की संगति में रहकर अपने अन्दर एक अच्छे सेनापति के गुणों को विकसितकर लिया। प्रधान सेनापति के रूप में उन्होंने बहुत लडाइयाँ जीती।

अकबर ने उन्हें वकील की पदवी से सम्मानित किया। उनके पहले यह सम्मान केवल उनके पिता बैरम खां को था  ।

रहीम का विवाह

रहीम का विवाह 16 साल की उम्र में महबानो से हुआ था। महबानो जीजा कोका की बहन थी। महबानो से रहीम की दो बेटियां और तीन बेटे हैं। उनके बच्चों के नाम इरिज, दरब और करण थे । ये सभी नाम बादशाह अकबर ने दिए थे। महबानो के अलावा उनकी दो और पत्नियां थी। रहीम की सबसे बड़ी बेटी जाना बेगम ने 1599 में शहजादा दनियाल से विवाह हुआ था  उनकी दूसरी बेटी ने मीर अमीनुद्दीन से विवाह हुआ था ।

गुजरात विजय

रहीम दास जी को गुजरात विजय करने के लिए अहमदाबाद में भेजा गया था। यह उनके जीवन का पहला युद्ध था। इसके बाद महाराणा प्रताप से युद्ध करने के लिए उन्हें मिर्जा। मानसिंह के साथ भेजा गया था।

रहीम ने गुजरात के अंतिम सुल्तान मुजफ्फर शाह के साथ एक निर्णायक लड़ाई लड़ी। और उसे हरा दिया। अब्दुल रहीम अकबर के गुरु बैरम खान के पुत्र थे। बादशाह अकबर के दरबार के रत्नों में से एक, अब्दुल रहीम को गुजरात का राज्यपाल नियुक्त किया गया और सरखेज के पास शाह को हराने के बाद सम्राट से ‘खान-ए-खानन’ की उपाधि दी गई।
गुजरात में रहीम का अभियान मुख्यतः 1583 और 1592 के बीच था।

इस जीत को चिह्नित करने के लिए, उन्होंने अहमदाबाद में युद्ध के मैदान पर फतेहवाड़ी (विजय का बगीचा) का निर्माण किया।

निश्चय ही रहीम की कलम और तलवार भी शक्तिशाली थी। उच्च कोटि के सेनापति और राजनीतिज्ञ होने के साथ ही रहीम श्रेष्ठ कोटि के कवि भी थे। अकबर का शासन काल हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल माना जाता है। इसी समय रहीम ने ब्रजभाषा, अवधी तथा खडी बोली में रचनाएँ की। उनकी प्रमुख रचनाएं रहीम सतसई. बरवै नायिका भेद, रास पंचाध्यायी, शृंगार सोरहा

रहीम समाज की कुरीतियों, आडम्बरों के भी आलोचक थे। वे मानवता के रचनाकार थे। उन्होंने एक सम्प्रदाय से दूर रह कर राम रहीम को एक माना। रहीम ने राम, सरस्वती, गणेश, कृष्ण, सूर्य, शिव-पार्वती हनुमान और गंगा की स्तुति की है। भाषा, धर्म-सम्प्रदाय में न उलझकर उन्होंने मानवधर्म को परम धर्म माना।

राजद्रोह के अभियोग में उन्हें कैद करवा लिया। उनकी सारी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया। जहाँगीर से रहीम की नहीं बनी। वह दुःखी होकर चित्रकूट चले आए। उन्होंने लिखा

चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस।

जा पर विपदा पड़त है, वहि आवत यहि देस।।

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उपाधिया

 अकबर ने रहीम का मिर्जा का पद् प्रदान किया था जोकि  मुगल काल में बहुत ही महत्वपूर्ण उपाधि थी। स्वयं बाबर को पहले मिर्जा की उपाधि प्रदान थी। 1579 अकबर ने उन्हें मिर्जा का पद प्रदान किया था 1584 में इनको उन्हें अकबर ने khan-e-khana की उपाधि से नवाजा गया उसके बाद उन्हें वकील की उपाधि भी प्रदान की गई। जहांगीर ने उन्हें वजीर उल मूल्क की उपाधि से सम्मानित किया था।

रहीमदास का साहित्यिक परिचय

रहीम का हिंदी साहित्य में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है उनकी गिनती भक्ति काल के श्रेष्ठ कवि जैसे तुलसीदास , कबीरदास , सूरदास ,मीराबाई आदि में की जाती है रहीम दास को संस्कृत, अरबी, हिंदी, फ़ारसी जैसी कई भाषाओं का ज्ञान था। उनके दोहे आम जन के दिलो को छू लेते है। रहीम दास की रचनाओं में भक्ति–प्रेम, नीति और श्रृंगार रस का भरपूर आनंद मिलता है ।रहीम दास जी ने। अपनी कविताओं में अधिकतम वहीं की जिगर रहिमन शब्द का प्रयोग किया है। रहीम मुसलमान थे लेकिन फिर भी कृष्णा के बहुत बड़ा भक्त थे।

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रहीम के दोहे अधिकतर भक्ति प्रेम श्रृंगार रस और नीति पर ही आधारित है। उन्होंने बहुत गहरी बातों को समझाने के लिए बहुत ही सरल शब्दों का प्रयोग किया। रहीम के विषय में ऐसा भी कहा जाता है कवि गंग के छंदों से बहुत प्रभावित हैं। रहीम दास जी की दानशीलता भी बहुत प्रसिद्ध है। ऐसा भी कहा जाता है कि रहीम दास तुलसीदास और केशवदास के बहुत अच्छे मित्र थे।

रहीम की भाषा शैली

रहीम दास जी  ने अवधी और ब्रज भाषा दोनों में कविता लिखी है उनकी कविता में रचित, शांत और हास्य रस पाए जाते हैं।उनकी भाषा बहुत सरल हैउनकी कविता में भक्ति, नैतिकता, प्रेम और श्रंगार का सुंदर समावेश है। दोहा, सोरठा, बरवै, कवित्त और सवैया उनके प्रिय छंद हैं।

काव्यगत विशेषताये

भाव पक्ष  रहीम कीकाव्यगत विशेषताये में उनके दोहे भाव पक्ष है   रहीम दास बहुत लोकप्रिय कवि हैंर हीम के काव्य की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता समरूपता है। उनकी राजनीति के दोहे आम आदमी की जुबान में रहते हैं अनुभव की सत्यता के कारण आम आदमी के जीवन में सटीकता के कारण उनके दोहे आम आदमी द्वारा बातचीत में उपयोग किए जाते हैं।  राजनीति के अलावा रहीम की कविता में भक्ति, वैराग्य, श्रृंगार,आदि का प्रीतिबिब मिलता है ।

मुसलमान होते हुए भी हिंदू होने के नाते श्रीकृष्ण में उनकी अटूट आस्था है।  कृष्ण पर कई कविताएँ और छंद लिखे है। उनके राजनीतिक दोहों में जीवन का गहरा अनुभव है।  बरवई नायिका – भेद में शास्त्रीय ज्ञान की झलक है। उन्होंने अपने काव्य में प्रभावशाली भाषा का प्रयोग किया है।

 कला-पक्ष-  भाषा की शैली- रहीम की भाषा अवधी और बृज दोनों मिलती है। ‘बरवई नायक भेद’ की भाषा अवधी है और ‘रहीम दोहावली’ की भाषा ब्रज है। अरबी, संस्कृत आदि अनेक भाषाओं के प्रवेश के कारण इनकी रचनाओं में इन भाषाओं के शब्दों का प्रयोग हुआ है। उनकी भाषा सरल, स्वाभाविक और महत्वपूर्ण है। रहीम की शैली वर्णनात्मक शैली है। उनके नैतिक दोहे सार्वजनिक जीवन में लोकप्रिय हैं जहाँ कवि ने इसे सरल और समझने योग्य बनाया है।यह सरल, सीधा और समझने योग्य है।  रहीम ने रचना की दृष्टि से मुक्तक शैली को अपनाया।

 रस-छन्द-अलंकार-रहीम की कविता में श्रृंगार, शांत रस शामिल है। श्रृंगार में संयोग और वियोग दोनों का वर्णन मिलता है। रहीम के पसंदीदा छंदों में सोरथा, बरवई, सवैया प्रमुख हैं। रूपक यमक दृश्टान्त आदि अलंकार प्रयोग हुए है रहीम मुसलमान होते हुए भी हिन्दी में अपने द्वारा रचित उत्कृष्ट कविता के लिए हिन्दी में बहुत गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं। हालांकि उन्होंने कोई महाकाव्य नहीं लिखा लेकिन उनकी रचनाओं में जीवन के विभिन्न अनुभवों का मार्मिक चित्रण मिलता है और अनुभवों की सत्यता के कारण वे हिंदी में बहुत लोकप्रिय हो गए।

रहीम की रचनाएँ

रहीम दोहावली, बरवै, नायिका भेद, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, नगर शोभा  रहीम रत्नावली, रहीम विलास, रहिमन विनोद, रहीम ‘कवितावली, रहिमन चंद्रिका, रहिमन शतक आदि।  इन्होंने बाबर की आत्मकथा तुजुक ए बाबरी का अनुवाद का अनुवाद फारसी भाषा में किया था जो कि पहले तुर्की भाषा में थी।

रहीम दोहावली कई बार कहा जाता है कि रहीम ने सत्सई की रचना की थी। लेकिन अब सत्सई की प्रामाणिक प्रति उपलब्ध नहीं थी।  रहीम की लोकप्रियता का कारण उनके दोहे  हैं। इनमें से अधिकांश नीति दोहे हैं। वैराग्य या श्रृंगार आदि। दोहों में कम वर्णित थे। उनकी कृति ‘दोहावली’ में ‘रहीम’ और ‘रहिमन’ नामों का उल्लेख है, जिसमें 299 दोहे हैं।

बरवै, नायिका भेद रहीम की यह बहुत प्रसिद्ध रचना हैं। उनकी पुस्तक बरवै, नायिका भेद को नायिका भेद का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। यह अवधी भाषा में लिखा गया है। रहीम ने इस पुस्तक में विभिन्न प्रकार की नायिकाओं का उदाहरण दिया है।

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मदनाष्टक रहीम की यह कृति हिन्दी से खड़ी बोली और संस्कृत की मिश्रित शैली में लिखी गई है। ‘मदन’ शब्द से ज्ञात होता है कि यह रचना श्रृंगार मय है। इसका विषय कृष्ण की रास-लीला है। यह कृष्ण-गोपियों के प्रेम की उत्कृष्टता का एक सुंदर प्रतिनिधित्व है।

नगर शोभा यह दोहों में रचित रहीम की स्वतंत्र रचना है। इसमें 142 दोहे हैं। यह एक खूबसूरत किताब है। इसमें अकबरी दरबार की सुंदरता की झलक है।

रहीम बहुभाषाविद थे। वह एक ही समय में कई भाषाओं के पारखी थे। उनके कुछ भक्ति गीत संस्कृत कविता के रूप में जाने जाते हैं। संस्कृत भाषा के साथ-साथ कुछ छंदों में हिंदी भाषा का भी प्रयोग किया गया है।

रहीम की मृत्यु

रहीम के अंतिम दिन बहुत ही संघर्षपूर्ण रहे  वह बीमार पड़ गए। उन्हें दिल्ली लाया गया जहाँ 1628 में उनकी मृत्यु हो गई। उन्हें हुमायूँ के मकबरे के सामने अपने ही द्वारा बनवाए गए अधूरे मकबरा में दफनाया गया। जिसे खान-ए-खान के नाम से जाना जाता था।अब्दुर्रहीम खानखाना अपनी रचनाओं के कारण आज भी जीवित हैं। अकबर के नवरत्नों में वे अकेले ऐसे रत्न थे जिनका कलम और तलवार पर समान अधिकार था। उन्होंने समाज के सामने ‘सर्वधर्म समभाव’ का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया जो मानव मात्र के लिए ग्रहणीय है।

रोचक तथ्य

रहीम दास जी अकबर के नवरत्नों में से एक थे। अन्य के नाम राजा बीरबल, मियां तानसेन, अबुल फजल, फैजी, राजा मान सिंह, राजा टोडर मल, मुल्ला दो प्याजा, है।

रहीम दास को तुर्की अरबी फारसी हिंदी संस्कृत भाषाओं का ज्ञान था। वे एक अच्छे कवि और कथाकार भी थे। वे ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता थे।

1623 में शाहजहां के विद्रोही हो जाने पर इन्होंने शाहजहां का साथ दिया था। जिस काऱण इनके और जहाँगीर के बीच कटुता आ गयी थी।

रहीम ने बाबर की आत्मकथा तुजुक ए बाबरी का अनुवाद चगताई भाषा से फारसी भाषा में किया था।

संस्कृत भाषा में, उन्होंने ज्योतिष पर दो पुस्तकें लिखीं, खेताकौटुकम और द्वैत्रिंशद्ययोगावली लिखी।

रहीम ने प्रसिद्ध युद्ध – हल्दी-घाटी युद्ध में भी भाग लिया था ये अकबर की सेना में थे।

रहीम का पूरा नाम क्या है ?

रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ानाँ था।

रहीम किस काल के कवि हैं ?

रहीम भक्ति काल के कवि हैं।

रहीम का जन्म कहां हुआ था ?

रहीम का जन्म लाहौर (जो अब पाकिस्तान में है) में 1556 ई0 में था।

रहीम के पिता कौन थे ?

रहीम के पिता का नाम  बैरम खां था ।

रहीम दास की माता का क्या नाम था?

रहीम दास की माता का नाम सुल्ताना बेगम था।

रहीम दास की पत्नी का क्या नाम था?

रहीम दास की पत्नी का नाम महा बानो बेगम था।

रहीम दास के बच्चो का क्या नाम था ?

रहीम के दो बेटियां और तीन बेटे हैं। उनके बच्चों के नाम इरिज, दरब और करण थे । रहीम की सबसे बड़ी बेटी जाना बेगम ने 1599 में दनियाल से शादी हुई थी । उनकी दूसरी बेटी ने मीर अमीनुद्दीन से शादी हुई ।

रहीम की मृत्यु कब हुई ?

रहीम के अंतिम दिन बहुत ही संघर्षपूर्ण रहे 1628 में उनकी मृत्यु हो गई

रहीम की भाषा शैली कौन सी थी ?
रहीम की भाषा शैली अवधी और ब्रज थी।

रहीम के काव्य की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता क्या है

रहीम के काव्य की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता समरूपता है। रहीम की कविता का मुख्य विषय श्रृंगार, राजनीति और भक्ति है। रहीम बहुत लोकप्रिय कवि थे। उनके दोहे आम आदमी के जीवन को प्रभावित करते है । उनके नैतिक दोहे जनजीवन लोकप्रिय हैं जिनमें कवि ने उन्हें सरल, सरल और बोधगम्य बना दिया है, जिसमें उन्होंने दैनिक जीवन का चित्रण किया है। अवधी और ब्रज भाषाओं पर रहीम का समान अधिकार था। उन्होंने अपने काव्य में प्रभावशाली भाषा का प्रयोग किया है।

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