मधुमेह (डायबिटीज) का इलाज होमियोपैथी आयुर्वेदिक

मधुमेह (डायबिटीज) Sugar in Hindi

मधुमेह (डायबिटीज) का इलाज होमियोपैथी आयुर्वेदिक

मधुमेह’ (डायबिटीज) को आयुर्वेद में इसे ‘ओजामेह’ तथा ‘क्षोद्रमेह’ के नाम से भी पुकारा है  ऐलोपैथी इस रोग के रोग के दो भेद माने गये हैं- (1) डायबिटीज मेलिटस
(2) डायबिटीज इनसिपिडस अर्थात् बहुमूत्र अर्थात् मधुमेह
हैट आयुर्वेद में इसे बहुमूत्र को ‘मूत्रमेह’ नाम दिया गया है और उसे मधमेह से – अलग भेद माना जाता है । ऐलोपैथी में केवल ‘डायबिटीज’ से मधुमेह का ही बोध होता है । मधुमेह का दूसरा अंग्रेजी नाम या’ श्लाइकोजुरिया’ (Glycosuria) भी है | होम्योपैथी’ तथा बायोकैमी लाक्षणिक-चिकित्सायें हैं । इनमें रोग के नाम नहीं होते परन्तु होम्योपैथी चिकित्सक भी सुविधा के लिए इन्हें अंग्रेजी (ऐलोपैथिक) नामों का प्रयोग करते हैं।

(मधुमेह) डायबिटीज के लक्षण Sugar Ke Lakshan

जब अत्यधिक परिमाण में स्वच्छ पानी जैसा पेशाब बार-बार हो, तब उसे ‘बहुमूत्र’ कहा जाता है । यदि इन्हीं लक्षणों के साथ रक्त में रहने वाली शक्कर भी पेशाब के साथ निकले तो उसे ‘मधुमेह’ कहते हैं ।
जिस रोगी व्यक्ति के पेशाब के साथ शक्कर (Sugar) निकलती है, वह जिस जगह पेशाब करता है, वहाँ चीटियाँ आ लगती हैं तथा मक्खियाँ बैठती हैं । यही इस रोग की सबसे बड़ी पहचान है।
‘मधुमेह’ के मुख्य लक्षण-

(1) अत्यधिक प्यास लगना

(2) तृप्त न हो पाने वाली भूख

(3) अधिक परिणाम में शर्करायुक्त वर्ण-विहीन पेशाब तथा

(4) शरीर का शुष्क एवं कमजोर होते जाना
मधुमेह रोग सामान्य होने पर रोगी दिन-रात में 4-5 सेर की मात्रा में पेशाब करता है, परन्तु जब बीमारी बढ़ जाती है, तब वह 24 घण्टे में 30-40 सेर तक पेशाब कर देता है । मधुमेह-रोगी के पेशाब में चीनी में अतिरिक्त अण्डलाल (एल्बुमेन) तथा अन्न-रस (काइल) भी रहता है । बीमारी के अधिक बढ़ जाने पर रोगी का मुख सूखा तथा लसलसा सा हो जाता है एवं मुख के भीतर का स्वाद मीठा अथवा खट्टा बना रहता है । जब बीमारी अत्यधिक बढ़ जाती है, तब मूत्र-नली के मुख पर घाव हो जाता है, पेशाब करते समय जलन होती है, पेशाब में दुर्गन्ध आती है, शरीर में खाज, जननेन्द्रिय में खुजली, फोड़ा, एक प्रकार का घाव, दाँतों की जड़ों का शिथिल पड़ जाना तथा उनमें खून निकलना, पेट हर समय खाली-सा अनुभव होना, जिसके कारण बार-बार भोजन करने की इच्छा तथा अत्यधिक मूत्रोत्सर्ग के कारण बारम्बार प्यास लगना और पानी पीना- ये सभी लक्षण प्रकट होते हैं। सिर के वालों का झड़ जाना, हाथ-पाँव में जलन तथा कमर में दर्द होना भी इस रोग के उपसर्ग हैं ।

रोग पुराना हो जाने पर दो जाने पर कब्ज, पाखाना खुश्क होना अथवा पतले दस्त,फोडा-फुन्सी तथा कार्बडल का प्रायः हो जाना ,शरीर के किसी भाग का छिल जाने पर शीघ्र आरोग्य न होने वाला सड़न-युक्त घाव हो जाना, मोतियाबिन्द, आँखों में दृष्टि-शक्ति कमी,  शरीर के ताप का घट जाना, स्मरण-शक्ति की कमी , शरीर से मीठी गन्ध आना
ये सभी लक्षण प्रकट होने लगते हैं ।

रोग की बहुत अधिक बढ़ी हुई अवस्था में कभी-कभी अचानक ही बेहोशी होती है, जिसे ‘डायबिटिक कोमा’ कहा जाता है । इस स्थिति में रोगी का शरीर ठण्डा पड़ जाता है, आँखें बैठ जाती हैं, मुख सिकुड़ जाता है, नाड़ी कमजोर परन्तु तीव्र चाल वाली होती है, और रोगी को कोई होश नहीं रहता है ।
‘बहुमूत्र’ में रोग के उपसर्ग धीरे-धीरे बढ़ते हैं | इसका मुख्य लक्षण निर्मल अथवा वर्ण-विहीन पेशाब का बारम्बार (जल्दी-जल्दी) तथा अत्यधिक मात्रा में होता है । इस रोग में प्यास पेशाब के परिणाम के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है । जीभ लाल तथा चमकीली दिखाई देती है, मुख हमेशा सूखा रहता है, शरीर का ताप घट जाता है तथा भूख प्रायः स्वाभाविक बनी रहती है । रोग बढ़ जाने पर पाचन-शक्ति की कमी, सिर-दर्द, शारीरिक-मानसिक तथा नायिक-दुर्बलता एवं मधुमेह’ के प्रायः सभी लक्षण प्रकट होने लगते हैं | इसके रोगी के पेशाब में कभी-कभी चीनी भी दिखाई देती है । सामान्य मात्रा में ऐल्बुमेन तथा अधिक मात्रा में, फास्फेट, आकजैलेट तथा युरेट्स निकलता है ।

(मधुमेह) डायबिटीज के कारण

‘मधुमेह’ की उत्पत्ति के मुख्य कारणों में, स्टार्च-युक्त पदार्थों का अधिक सेवन, अत्यधिक मानसिक-परिश्रम, अध्ययन, चिन्ता तथा वंशगत दोष रहते हैं । मधुमेही माता या पिता की.सन्तान भी प्रायः इस रोग से ग्रस्त रहती है । इसी कारण यह बीमारी छोटे बच्चों में भी पाई जाती है ।
शरीर का एकाएक बहुत स्थूल (मोटा) हो जाना— इस बीमारी का पूर्व लक्षण हैं । यकृत्, मस्तिष्क अथवा मेरुमज्जा में चोट लगना, क्लोम-ग्रन्थि की बीमारी, गठिया, मलेरिया अथवा उपदंश की बीमारी के प्रभाव तथा क्लोरोफार्म आदि सूंघने के बाद भी यह रोग हो जाया करता है । आयुर्वेद के मन में सब प्रकार के प्रमेह उचित चिकित्सा न होने मधुमेह में बदल जाते हैं।

सामान्यता या रोग 30 से 60 वर्ष की आयु में अधिक होता है । पुरषो की अपेक्षा स्त्रियाँ इस रोग की कम शिकार होती है । परन्तु यह रोग किसी भी आयु के स्त्री पुरुष को विभिन्न कारणों से हो सकती है ।
‘बहुमूत्र रोग के कारणों में वंशानुगत दोष, स्नायुमण्डल पर प्रवल आघात , अधिक शराब पीना,  मस्तिष्क का अखंद, छटे पाय पक्षाघात, पेट में ट्यूमर अथवा एन्यूरिज्म जादि होते हैं ।
आयुर्वेद, यूनानी तथा प्राकृतिक चिकित्सकों के मत में मूलतः यह है पाचन क्रिया की गड़बड़ी से ही होता है । अत्यधिक उष्ण पदार्थों का अधिक सेवा अति मैथुन, एक ही स्थान पर सुख से बैठे रहना, अधिक सोना, परिश्रम तथा चिन करना, भारी चिकने, मीठे-खट्टे तथा खारे पदार्थों को अत्यधिक खाना, नया ”
और नये जल का सेवन, ठण्ड अथवा सर्दी लगना, मद्यपान आदि कारणों से मधुमेह रोग उत्पन्न हो जाता है ।
जिन लोगों के माता-पिता इस रोग से ग्रस्त होते हैं, उन्हें यह रोग वंश-परण से मिलता है । ऐसा रोग ऐलोपैथी की दृष्टि में कष्ट-साध्य अथवा असाध्य मान जाता है परन्तु आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में यह रोग रोग असा नहीं है । उचित चिकित्सा द्वारा इसे समूल नष्ट किया जा सकता है । होमियोपैथी तथा बायोकैमी इस रोग को जड़ से नष्ट कर देने का दावा करती हैं।

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पथ्यापथ्य

मधुमेह तथा बहुमूत्र– दोनों ही रोगों के लिए पथ्यापथ्य एक समान हैं। उन्हें निम्नानुसार समझना चाहिए
अपथ्य- आटा, मैदा, भात, चावल, आलू, साग, बार्ली (कार्बो-हाइड्रेट्स), चीनी अथवा चीनी-युक्त मीठे पदार्थ तथा जिन साग-सब्जी एवं फलों में चीनी का अंश अधिक हों, उन्हें खाना एकदम छोड़ देना चाहिए | मधुमेह के रोगी को गुड़ अथवा चीनी न खाकर, उसके बदले सैकरीन अथवा ग्लसरीन का सेवन करना चाहिए । स्थूल-काय रोगियों को स्टार्च वाले आहारों का सेवन बिल्कुल बन्द कर ने से भी कोई अनिष्ट नहीं होता । गरिष्ठ, देर से पचने वाली तथा मेद बढ़ाने वाली स्तुओं का सेवन त्याग देना ही उचित है । यूनानी मत में ठण्डे पानी, बर्फ तथा न्य शीतल पदार्तों से परहेज करना आवश्यक है । धूप में घूमना या बैठना, रश्रम का कार्य, माँस, मछली, अण्डा, तेल, बैंगन, भिण्डी, सेब, नासपाती, आम, आदि का सेवन न करे।

पथ्य-

एलोपैथिक चिकित्सा के मतानुसार इस रोग में माँस, अण्डे, दूध का सेवन पथ्य है धूम्रपान तथा हर प्रकार का नशा. शायन आदि को विल्कुल त्याग देना चाहिए । परन्तु प्राकृतिक चिकित्सकों के मतानुसार माँस का सेवन हानिकारक है क्योंकि उसकी गिनती अम्लकारक पदार्थों में होती है। दूध में शर्करा तथा मक्खन होता है अतः इसका प्रयोग चिकित्सा के
की मलाई तथा थोड़ी मात्र माँस का सेवन हानिकारक है। एलोपैथिक चिकित्सा के मतानुसार इस रोग में माँस, अण्डे, दूध
पथ्य है ।
सन्तरा, नीबू , अनन्नास, मकोय, जामुन, टमाटर आदि खट्टे फल, मक्खन दही का मट्ठा, लौकी, परवल, तोरई, नेनुआ, करेला, बथुआ, चौलाई, आदि साग-सब्जी का प्रयोग हितकर रहता है ।
यदि रोटी खायी जाय तो वह चोकर सहित आटे की बनी होनी चाहिए। रोटी (गेहूँ, चना, जौ से निर्मित) अधिक लाभकारी सिद्ध होती है | चाय अथवा कॉफी विना चीनी की पी जा सकती है ।
कागजी नींबू के रस में थोड़े से नमक के साथ पानी में डालकर पीने से अधिक लाभ होता है ।  मधुमेह के रोगी को प्रतिदिन में दो-तीन मील खुली हवा में टहलना बहुत आवश्यक है | जो लोग नित्य पैदल घूमते रहते हैं, उन पर यह रोग अपना प्रभाव नहीं दिखा पाता । खुली हवा, स्वच्छ जल, प्रसन्नता-दायक वातावरण, निश्चिन्तता, आमोद-प्रमोद- ये सब मधुमेह तथा बहुमूत्र के रोगी के लिए पथ्य हैं ।
मधुमेह के रोगी को प्रतिदिन थोड़ा बहुत व्यायाम भी अवश्य करते रहना चाहिए । सुबह-शाम घूमने के अतिरिक्त डण्ड-बैठक लगाना, मुद्गर घुमाना तथा शरीर की मालिश- ये सब अच्छे तथा लाभकारी व्यायाम हैं । रोगी को सर्दी से बच रहने का प्रयत्ल करना आवश्यक है । ठण्ड के समय में उसे हमेशा गरम कपड़े पहने रहना चाहिए ।

(मधुमेह) डायबिटीज आयुर्वेदिक चिकित्सा

आयुर्वेद में मधुमेह की गणना प्रमेह रोग के अन्तर्गत की गई है । यद्यपि आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में इसे ओजोमेह, क्षौद्रमेह आदि अनेक नामों से पुकारा गया है, परन्तु सामान्यतः इसका ‘मधुमेह’ नाम ही प्रचलित है ।
यह मान्यता भी है कि 20 प्रकार के प्रमेह उचित चिकित्सा के अभाव में, अन्त में मधुमेह में ही परिवर्तित हो जाते हैं । इस सम्बन्ध में पहले प्रकरण में पर्याप्त प्रकाश डाला जा चुका है ।
मधुमेह की चिकित्सा में निम्नलिखित आयुर्वेदीय औषध-योग लाभकारी सिद्ध होते हैं । स्मरणीय है कि आयुर्वेद ही एकमात्र ऐसी चिकित्सा विधि है जो मधुमेह रोग को जड़ से नष्ट कर देने का दावा करती है।

आयुर्वेदिक पेटेंट औषधियाँ

स्वर्ण बसन्त मालती

हेम नाथ रस

बसंत कुसुमाकर रस,

कन्दर्प जीवन रस

तालकेश्वरी रस

चन्द्रोदय मकरध्वज रस

अश्वनि कुगार पाक

चन्द्रप्रभा वटी

उक्त शास्त्रीय औषधियों की निर्माण विधि की जानकारी के लिए चरक,  वाग्भट्ट, भैषज्य रत्नावली आदि आयुर्वेद के प्रामाणिक ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए ।
उक्त औषधियाँ बाजार में बनी-बनाई भी मिल जाती हैं । यदि तैयार औषध ही खरीदनी हो तो किसी विश्वस्त संस्थान द्वारा निर्मित तथा विश्वस्त दुकानदार से ही लेनी चाहिए । शास्त्रोक्त औषधियों का प्रयोग व्यस्था-पत्र में दिये गये निर्देशानुसार तथा किसी अनुभवी-चिकित्सक के परामर्शानुसार ही करना चाहिए । अन्य योगों के विषय में भी यही नियम लागू होता है ।
प्रमेह-नाशक सरल योग निम्नलिखित सभी योग मधुमेह में चमत्कारी प्रभाव प्रदर्शित करते हैं

प्रमेह-नाशक सरल योग निम्नलिखित सभी योग मधुमेह में चमत्कारी प्रभाव प्रदर्शित करते हैं
(1) गुड़मार बूटी 8 तोला, 4 माशा, छाया में सुखाई हुई, जामुन की गिरी 200 नग, कालीमिर्च 500 नग- इन सबको कूट-पीस-छानकर रख लें। मात्रा- 6 माशा, प्रातः-सायं । ताजे बेलपत्र नग 25 को 1 छटाँक पानी में ठण्डाई की भाँति घोंटकर उक्त चूर्ण को फाँकने के बाद ऊपर से पी लें । इससे मधुमेह में शीघ्र लाभ होता है ।
(2) काली जामुन की गिरी 14 माशा, फौलाद भस्म 2 माशा तथा अफीम 1 माशा लें । पहले गुठली का महीन चूर्ण करें, फिर उसमें अन्य दोनों औषधियाँ मिलाकर घोटें तथा 1-1 माशा की गोली बनाकर रख लें । मात्रा1 से 2 माशा तक । अनुपान पूर्वोक्त योग के अनुसार लें । मधुमेह में लाभ होगा।

(3) जामुन की गिरा 10 तोला तथा लौहगण । तोला ले । जाभुन को निती का महीन चूर्ण करने, किरत लौह भरग गिलाकर, पोरकर ले । भावा- 1 माशा, गाय के दम बडूनही के साथ प्रातः सायं सेवन कर रहे । इससे मधुमेह दूर हो जाता है ।
(4) जामुन की कोपल, बेल के पत्ते तथा गुड़गार बूरी-इन्हें 4.1 माशा लेकर, पावभर गाय के शुद्ध दूध में डालकर जौटायें तथा उसे चीनी डा बिना पी जायें । पातः साय नियमित सेवन करते रहने से गधुगेह कुछ ही दिनों में दूर हो जाता है।
(5) तिल 2 तोला तथा गुड 2 तोला – इन दोनों को मिलाकर सेवन करते रहने से भी मधुमेह में आश्चर्यजनक लाभ होता है । तिलों में मूत्र को कम करने की शक्ति पाई जाती है ।
(6) शिलाजीत 6 रत्ती को शहद के साथ प्रातः-सायं चाटने से भी मधुमेह में अवश्य लाभ होता है ।
(7) चन्द्रप्रभा वटी, हल्दी का चूर्ण आँवले का रस तीनों को समभाग लेकर- शहद के साथ सेवन करने से मधुमेह दूर होता है ।
(8) मकरध्वज 1 रत्ती तथा जामुन की गुठली का चूर्ण 1 माशा को शहद के साथ सेवन करते रहने से पेशाब में शक्कर जाना अवश्य दूर हो जाता है।
(9) गुड़मार बूटी का चूर्ण 1 माशा तथा स्वर्णभस्म – रत्ती इन्हें शहद के साथ सेवन करते रहने से मधुमेह दूर होता है ।
(10) जामुन की गुठलियों को छाया में सुखाकर चूर्ण कर लें । 6 माशा चूर्ण प्रातः,मध्याह्न, सायं-दिन में तीन बार शहद के साथ 1 माशा तक सेवन करते रहने से मधुमेह से मुक्ति मिल जाती है ।
(11) केवल जामुन के पके फलों को खूब खाते रहने से ही मधुमेह में पर्याप्त लाभ होता है ।
(12) बेलपत्र नग 11 लेकर, थोड़े से पानी में महीन पीसकर कपड़े में छान कर पी जायँ । प्रतिदिन 2-2 पत्ते बढ़ाते जायें । जब 51 पत्ते तक संख्या पहुँच जाय, उसके दूसरे दिन 2-2 पत्ते कम करते चले जायें । अन्त में केवल 1 पत्ता रह जायेगा, तब तक मधुमेह पूर्णतः नष्ट हो जायेगा ।

(13) बसन्त कुसुमार रस 1-1 गोली बेलपत्र के रस के साथ सेवन पत्रों को सिल पर उनका स्वरस निकाल कर एक कटोरी में रखसमार रस की 1 गोली को पुराने शहद में घोंट कर चाटें पत्र का रस पी जायें । नित्य प्रातः-सायं इसी प्रकार सेवन करते
करें। 10 बेलपत्रों को में । फिर, बसन्त कसमार तथा ऊपर से बेलपत्र को रहने से अपूर्व लाभ होता है।

(14) बसन्त कुसुमार रस डेढ़ रत्ती  1-1 मात्रा प्रातः-सायं मक्खन अथवा शहद “सेवन करें । इसके अतिरिक्त दोपहर तथा रात्रि के समय विजयसार (एक प्रकार की लकड़ी) के चूर्ण को पानी में भिगोकर तथा उस पानी को छानकर 1-1 शिलास पीते रहें । इससे मधुमेह अवश्य नष्ट हो जाता है ।
(15) बसन्त कुसुमार रस – से 2 रत्ती तक, दिन में 2 बार आँवले के स्वरस तथा शहद के साथ सेवन करते रहने से मधुमेह दूर होता है ।
(16) केवल बेलपत्र के स्वरस 5 से 10 तोला तक को शहद के साथ सेवन करते रहने से मधुमेह दूर हो जाता है ।
(17) जामुन की गुठली के चूर्ण 11 माशा तक बसन्त कुसुमार 1 रत्ती- इन्हें प्रातःकाल सौंफ के अर्क के साथ सेवन करते रहने से मधुमेह नष्ट हो जाता है ।
(18) गोदुग्ध में शोधित आँवलासार गन्धक तथा मिश्री- इन दोनों को समभाग लेकर चूर्ण बना लें । मात्रा- 6-6 माशा, प्रातः-सायं बेलपत्र अथवा केवड़े की जड़ के काढ़े के साथ 31 दिन तक नित्य सेवन करते रहने से मधुमेह नष्ट होता है ।
(19) बङ्गभस्म 1 रत्ती, शिलाजीत 3 रत्ती तथा मोतीभस्म -2 रत्ती – इन्हें दिन में 2 बार शहद के साथ चाटते रहने से मधुमेह में लाभ होता है |
(20) मोतीभस्म 3 रत्ती तथा जामुन की गुठली का चूर्ण 1 1 माशा प्रातः-सायं बेलपत्र लें स्वरस के साथ सेवन करते रहने से मधुमेह नष्ट होता है ।
(21) गौ-दुग्ध में शुद्ध किया गया आँवलासार गन्धक तथा मिश्री- दोनों को समभाग लेकर चूर्ण कर लें । मात्रा- 6-6 माशा, प्रातः-सायं, बेलपत्र अथवा केवड़े की जड़ के काढ़े के साथ 31 दिन तक सेवन करते रहने से मधुमेह नष्टहोता है । यह योग हर प्रकार के प्रमेह को भी दूर करता है । मन्दागिनी को इसे कम मात्रा में लेना चाहिए ।
(22) बड़े जामुन की अन्तरछाल को सुखाकर जलायें । सफेद हो जाते पर पीस कर रख लें ।
मूत्र में गुरुत्व होने पर उक्त भस्म को 15 रत्ती की मात्रा में निहाल सेवन करें । दूसरी तथा तीसरी मात्रा दोपहर तथा शाम के समय 2 1 तोला में घोलकर पियें । यदि मूत्र में शक्कर की मात्रा कम हो तो भस्म की मात्रा 10-10 रत्ती ही रखनी चाहिए । पथ्यपूर्वक 165 दिन तक सेवन करते रहने से म अवश्य दूर हो जाता है ।
(23) खिरैटी, गूलर, बबूल तथा आँवले के पत्ते-इन सबको समाधान लेकर चूर्ण कर लें । मात्रा- 6 माशा, धारोष्ण दूध के साथ नित्य सेवन करें। 21 दिन तक जौ की रोटी एवं मूंग की दाल का ही सेवन करते रहें । इससे मधुमेह दूर हो जायेगा |
(24) गिलोय, हल्दी तथा बेलपत्र 6-6 माशा और त्रिफला 12 तोला- इन सबको जौ-कुट करके रात के साय 2 छटाँक पानी में डालकर किसी पत्थर अथवा चीनी-मिट्टी के बर्तन में भरकर रख दें । प्रातः मलकर छान लें। इस मथे हुए पानी को प्रातः-सायं 1-1 छटाँक 2 तोला शहद मिलाकर सेवन करते रहने से भी मधुमेह में लाभ होता है ।
(25) प्रतिदिन प्रातः-सायं 1-1 माशा जामुन की गुठली का चूर्ण शहद के साथ चाट कर, ऊपर से थोड़ा-सा जामुन का सिरका पीते रहने से मधुमेह दूर हो जाता है ।
(26) मेंहदी 2 तोला, ब्राह्मी 2 तोला, गुलाब के फूल 2 तोला, शिलाजीत 1 तोला तथा कमीला 6 माशा इनका चूर्ण बना लें । मात्रा – 11 माशा, प्रातः-सायं बिना शक्कर मिले गरम दूध के साथ सेवन करते रहने से डायबिटीज नष्ट होता है । अन्य प्रकार के प्रमेहों में भी यह योग लाभकारी है ।
(27) बङ्ग भस्म, नाग भस्म तथा लौह भस्म- इन सबको 1-1 रत्ती लें । यह 1 मात्रा है, इसे मक्खन अथवा मलाई के साथ नित्य सेवन करत रहने से डायबिटीज दूर होता है ।

होमियोपैथिक चिकित्सा

वैसे तो होमियोपैथी लाक्षणिक चिकित्सा है और उसमें किसी रोग का नाम ही किया जाता फिर भी सर्वसाधारण में प्रचलित नियमानुसार कि चिकित्सा भी ‘मधुमेह’ को ‘डायबिटीज’ (Diabetes) के नाम से ही जाना जाता है। इसका दूसरा नाम ‘ग्लाइकोजुरिया’ (Glycosuria) है ।
होमियोपैथी चिकित्सकों के मत में भी यह रोग दो प्रकार का होता है1) डायबिटीज मेलिटस (Diabetes Mellitus) अर्थात् मधुमेह और (2) हायबिटीज इन्सिपिडस (Diabetes Insipidus) अर्थात् मूत्रमेह या बहुमूत्र |  मधुमेह तथा मूत्रमेह (बहुमूत्र) की चिकित्सा में लक्षणानुसार निम्नलिखित होमियोपैथिक औषधियों का व्यववहार करें ।
डायबिटीज मेलिटस (मधुमेह) ‘मधुमेह’ में निम्नलिखित औषधियाँ लाभकर सिद्ध होती हैं

यूरेनियम नाइट्रिकम 2x, 6, 30-

पेशाब में अधिक मात्रा में चीनी (Sugar) जाना, दिन-रात में बहुत बार तथा अधिक परिमाण में पेशाब होना, न बुझने वाली तीव्र प्यास, अधिक खाना खाने पर भी शरीर का दिन-पर-दिन. क्षीण होते. जाना, पेशाब के आपेक्षिक गुरुत्व का बढ़ना, शरीर की ऊष्मा में कमी आ जाना, जननेन्द्रिय में घाव होना तथा पेट फूलना आदि लक्षणों में यह औषध विशेष लाभ करती है । निम्न क्रम में प्रतिदिन दो मात्राएँ 10-12 दिन तक सेवन करें अथवा 30 क्रम में 1 मात्रा प्रातःकाल खाली पेट सेवन करने के बाद 7-8 दिन तक परिणाम की प्रतीक्षा करें । यदि लाभ न हो तो आठवें दिन एक मात्रा
का प्रयोग और करें ।

सिजिजियम जम्बोलिनम Q , 2x-

यह मधुमेह के लिए सर्वोत्तम औषध मानी जाती है । पेशाब में अधिक चीनी आना, तीव्र प्यास, पेशाब बार-बार तथा अधिक मात्रा में होना में वद्धि, मधुमेह के कारण शरीर में घाव तथा के लक्षणों में  से शीघ्र लाभ होता है।

मधुमेह (डायबिटीज) का इलाज होमियोपैथी आयुर्वेदिक

क्रियोजोट 6, 12 , 30

बार-बार मूत्र होना, असह्य प्यास, में अत्यन्त जलन, मूत्र वेग न रोक पाने के लक्षणों में इसका प्रयोग हितकर रहता है।

ऐसिड एसेटिकम 6, 30 –

पानी जैसा साफ पेशाब बार-बार होना शरीर की त्वचा पर फीकापन या सूखापन, शरीर में अत्यन्त जलन  ,वमन, शोथ आदि के लक्षण होने या न होने पर यह औषध लाभ करती है।

मधुमेह (डायबिटीज) का इलाज होमियोपैथी आयुर्वेदिक

रस एरोमेटिक –

पेशाब के आपेक्षिक गुरुत्व में कमी  अधिक परिमाण में पेशाब होना, पेशाब में एल्बुमेन की उपस्थिति त अतिरिक्त पेशाब के पूर्व एक प्रकार का भयानक दर्द होना, जिसके। हर बार चिल्ला उठता हो अथवा बूँद-बूंद पेशाब निकलने के लक्षण हितकर है । मदर-टिंक्चर की 10 अथवा अधिक बूंद की 1 मात्रा देने से होता है ।

रस एरोमेटिक

आर्सेनिक ब्रोमाइड  Q –

यह औषध चर्म रोग तथा उपदंश के रोग वाले रोगी के बहुमूत्र में शीघ्र लाभ करती है । इसके मूल अर्क को 2 से 4 बूद तक की मात्रा में पानी के साथ नित्य एक बार लेना चाहिए ।

प्लमबम आयोड 6x- युरिक एसिड ग्रस्त रोगियों के लिए यह औषध बहुत लाभकर है।

एसिड फास्फोरिकम् 1x, 6-

स्नायु-मण्डल के किसी रोग के साथ बहुत बार पेशाब आना, धातु-दौर्बल्य, शरीर का क्षय, रात के समय कमर में दद, चित्त की चंचलता, सुस्ती, उदासी, चीनी मिश्रित अत्यधिक पेशाब, मूत्र-ग्रन्थि तथा पीठ में दर्द, तीव्र तथा अदम्य प्यास, दुर्बलता, स्मरण-शक्ति की कमी एवं जननान्द्रय की दुर्बलता आदि लक्षणों में हितकर है ।

कोडीनम  2-

बहुमूत्र के साथ बेचैनी, त्वचा का उपदाह (खुजली, जा अथवा सुन्नता का अनुभव ), मानसिक अवसन्नता, काँटा चुभने जैसा दर्द  कपकपी तथा हाथ-पाँवों का अपने आप ऐंठना आदि लक्षणा में  ।

प्राकृतिक चिकित्सा

1)  मांस दाल आटा चावल घी और चीनी ये सभी अम्लकारक होते है। इनका सेवन न करे।

2 ) मधुमेह के रोगी को घी हानिकारक है। घी की अधिकता भोजन के पचने में कठनाई होती है

3 ) मधुमेह की चिकित्सा में  बथुआ , कुलफा तोरई, परवल पालक,  परवल, लौकी, नेनुआ, करेला, का सेवन उचित रहता है
फलों में सन्तरा, अनन्नास, नींबू, टमाटर लों का सेवन अधिक करना चाहिए । जामुन के फलों का सेवन
अधिक लाभकारी सिद्ध होता है।

4 ) आलू, शलजम, अरबी, चुकन्दर, काशीफल, भिण्डी आदि तरकारियों अधिक मात्रा में होता है तथा अंगूर, आम, केला, सेब, नाशपाती फलों में चीनी की मात्रा अधिक पाई जाती है, अतः इनका सेवन अल्प मात्रा केवल तभी करना चाहिए, जब पेशाब में चीनी आना बन्द अथवा बहुत कम जाय  चिकित्सा में दूध का सेवन करना भी उचित नहीं है, क्योंकि दुग्ध-शर्करा एवं मक्खन रहता है । दूध के स्थान पर मक्खन निकाला हुआ गट्ठा सेवन करना उचित है ।
खान-पान में उक्त सावधानी रखने से पेशाब में चीनी आना बन्द हो जायेगा तथा पाचन क्रिया सुधर जायेगी । यह स्मरण रखना चाहिए कि मधुमेह भी पाचन सम्बन्धी ही एक रोग है । जब पाचन क्रिया ठीक हो जाती है, जब इस रोग के दूर होने में देर नहीं लगती ।
(5) चिकित्सा के आरम्भ में उक्त क्षार-बर्द्धक एवं हल्का भोजन आरम्भ करने से पूर्व यदि एक छोटा सा उपवास भी कर लिया जाय तो शीघ्र लाभ होता है । उपवास 3 दिन से अधिक का नहीं होना चाहिए । उपवास पाचन-क्रिया को सुधारने में अत्यधिक सहायता पहुँचाता है । उपवास-काल में सन्तरे का रस अथवा किसी अन्य खट्टे फल के रस को सादा अथवा पानी में मिलाकर पीते रहना उचित है । उपवास-काल में नित्य दो-ढाई सेर पानी अवश्य पीना चाहिए । साथ ही प्रतिदिन एनीमा लेकर पेट भी साफ कर लेना चाहिए । एनिमा मल के साथ ही पेट की गरमी को बाहर निकाल फेंकता है । उपवास के बाद भी यदि कभी कब्ज का अनुभव हो तो एनीमा अवश्य लेना चाहिए |
(6) उपर्युक्त विधि से, चिकित्सा आरम्भ करने के पहले तीन दिनों तक उपवास रखें । फिर चौथे दिन एक-एक पाव की मात्रा में तरकारियों का सूप अथवा किसी खट्टे फल का रस दिन में तीन बार मिलाया जा सकता है, परन्तु नमक नहीं डालना लिए नमक हितकर नहीं होता । ऐसे रोगियों को मात्रा में नमक का सेवन नहीं करना चाहिए ।। छठे दिन दोपहर और साथ लें ।
7) चिकित्सा आरम्भ करने के पांचवे दिन से मट्टा लेना। डेढ-डेढ पाव की मात्रा में मट्ठा पीना चाहिए । जामुन का डेढ़ पाव रस पीयें अप सेर के लगभग जामुन के फल खाये ।
(8) उक्त क्रम को तीन चार सप्ताह तक चलायें अर्थात इस अतमि केवल मट्ठा, शाक-तरकारी एवं फलों का ही सेवन करते रहें । तर के समय मट्टे के बदले चोकरयुक्त आटे की तीन-चार रोटियाँ शाक-तरकारी के मार लें तथा प्रातः एवं सायंकाल का आहार पूर्ववत् चलने दें । इस क्रम को दो तीन सप्ताह तक चलावें । इस प्रकार कुल छः सात सप्ताह तक यह क्रम यदि नियमित चलता रहा तो मधुमेह रोग नष्ट हो जायेगा । यदि एक बार के क्रम में पूरा लाम न हो तो पुनः उपवास से आरम्भ करके इसी क्रम को दुहराना आवश्यक है । दूसरे क्रम में उपवास तीन के स्थान पर पाँच दिन तक रखना चाहिए । तत्पश्चात् तीन सप्ताह के बदले चार-पाँच सप्ताह तक मट्ठा, शाक-सब्जी एवं फलों पर निर्भर रहना चाहिए मट्ठा तथा तरकारियों को लेने की अवधि में भी, हर सप्ताह में एक दिन का उपवास करते रहना अधिक लाभकारी रहेगा |
(9) उक्त विधि से 99 प्रतिशत रोगी मधमेह से मुक्त हो जाते है । यदि कोई रोगी इतने पर भी ठीक न हो तो उसे तीसरी बार तीन-चार दिन की उपवास करने के बाद मट्ठा, सेवन न करके तीन चार सप्ताह तक केवल फल
तरकारियों का ही सेवन करना चाहिए | इस प्रकार महीने मर तक फल से शरीर का वजन काफी घट जायेगा | उसके बाद में मट्ठा-कल किया जा सकेगा | मट्ठा-कल्प की सामान्य विधि निम्नानुसार हैं

(10) मधुमेह के रोगी को दिन-रात हर समय स्वच्छ हवादार जगह में रहना चाहिए तथा किसी खुली जगह में सोना चाहिए । यदि कमरे में सोना पड़े तो उसकी सभी खिड़कियाँ खुली रहनी चाहिए, ताकि शुद्ध वायु का आवागमन बना रहे । दिन में तीन-चार बार 5-7 मिनट तक शुद्ध वायु में गहरी साँस लेकर उसे धीरे-धीरे बाहर निकालना भी लाभकर रहता है ।
(11) मधुमेह के रोगी को तेज धूप से बचना चाहिए, क्योंकि उसे धूप में चक्कर आने लगते हैं । परन्तु जाड़ों में नित्य तथा गर्मी के मौसम में सप्ताह में 2-3 बार कुछ देर प्रातःकालीन धूप में बैठना हितकर रहता है । यदि ऐसी धूप में भी सुस्ती का अनुभव हो तो धूप-स्नान लेते समय सिर के ऊपर ठण्डे पानी में भीगा तौलिया रख लेना चाहिए तथा धूप-स्नान के बाद सम्पूर्ण शरीर को या तो गीले तौलिये से पौंछ लेना चाहिए अथवा ठण्डे पानी से स्नान कर लेना चाहिए ।।
(12) मधुमेह के रोगी के लिए नित्य व्यायाम करना अत्यन्त आवश्यक है, इससे रक्त-स्थित शर्करा जलती है तथा पसीने के माध्यम से शरीर की भीतरी गन्दगी भी बाहर निकल जाती है ।
व्यायामों में कोई कठिन शारीरिक श्रम करने की अपेक्षा टहलना सर्वोत्तम रहता है । प्रतिदिन प्रातःकाल स्वच्छ वायु में गहरी श्वास लेते हुए शक्ति के अनुसार एक-दो अथवा तीन मील तक टहलना चाहिए । अङ्ग-प्रत्यङ्ग के लिए स्फूर्तिदायक तथा मांस-पेशियों पर प्रबाव डालने वाली कुछ सामान्य कसरतों को भी किया जा सकता है |
(13) मधुमेह के रोगी को सुस्ती दूर करने के लिए गरम ठण्डे पानी का स्रान हितकर रहता है । पहेल शारीरिक ताप से 2-3 डिग्री अधिक गरम पानी से स्रान करने के बाद तुरन्त ही ठण्डे पानी से मल-मल कर नहाना ही ‘गरम ठण्डा सान’ कहा जाता है । यह स्रान प्रतिदिन प्रातः-सायं दो बार लिया जाय तो सर्वोत्तम है, अन्यथा एक बार तो लेना ही चाहिए । यदि नींद न आने की शिकायत हो तो शय्या पर जाने से पूर्व उक्त विधि से स्नान लेना बहुत हितकर रहता है । इस खान के बाद गहरी नींद अवश्य आती है ।

 

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