ज्ञान पर दोहे 

ज्ञान पर दोहे

नमस्कार दोस्तों आज हम इस पोस्ट में जानेंगे महान लेखकों द्वारा लिखे गए ज्ञान पर दोहे जो हमारे दैनिक जीवन की दिशा बदल सकते हैं

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ज्ञान पर दोहे

ज्ञानी करता ज्ञान से,जग में करम महान।
भूल नहीं जाना कभी,ज्ञानी का अवदान।।

अर्थ- ज्ञानी अपने ज्ञान के बल पर इस संसार में महान कार्य कर जाते है।  यह दुनिया उनकी कार्यो को हमेसा याद करेगी।

ज्ञानी गढ़कर ज्ञान को,नित दिखलाता राह।
पूरण करता ज्ञान से,इस दुनिया की चाह।।

अर्थ – ज्ञानी व्यक्ति अपने ज्ञान से हमें अपने जीवन की राह दीखता है।

ज्ञान पर दोहे

पंडित पढ़ते वेद को, पुस्तक हस्ति लाद

भक्ति ना जाने हरि की, सबे परीक्षा बाद।

अर्थ- पंडित वेदों को पढ़ते है। हाथी पर लादने लायक ढ़ेर सारी पुस्तकें पढ़ जाते हैं। किंतु यदि वे हरि की भक्ति नहीं जानते हैं-तो उनका पढ़ना व्यर्थ है और उनकी परीक्षा बेेकार चली जाती है।

ज्ञान पर दोहे

गुरुवर सब ज्ञानी सदा,देकर अनुपम ज्ञान।
कुंदन सम निज शिष्य को,करता परम महान।।

अर्थ – गुरु महान होता है उसका ज्ञान सोने के सामान होता है।

 

नहि कागद नहि लेखनी, नहि अक्षर है सोय

बाांचहि पुस्तक छोरिके, पंडित कहिय सोय।

अर्थ- बिना कागज,कलम या अक्षर ज्ञान के पुस्तक छोड़कर जो संत आत्म-चिंतन और मनन करता है उसे हीं पंडित कहना उचित है।

ज्ञान पर दोहे

ज्ञान ध्यान अनुराग की,ज्ञानी करते बात।
दुनिया में विज्ञान की,यही परम अनुपात।।

अर्थ ज्ञानी लोग ज्ञान ध्यान से ही इस दुनिया में विज्ञानं की उत्पत्ति होती है

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ज्ञान पर दोहे

काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान ।
तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान ।।

अर्थ- जब तक व्यक्ति के मन में काम की भावना, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं. तबतक एक ज्ञानी व्यक्ति और मूर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं होता है, दोनों एक हीं जैसे होते हैं।

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ज्ञान पर दोहे

ज्ञानी जन की वंदना,अमृत सम कोहिनूर।
चरण परम यह छोड़कर,मत रहना तुम दूर।।

अर्थ – ज्ञानी की वंदना करना अमृत के सामान है। इससे हमें कभी भी दूर नहीं रहना चाहिए। यह परम पद के सामान है।

ज्ञान पर दोहे

तुलसी साथी विपत्ति के विद्या विनय विवेक ।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत राम भरोसे एक ।।

अर्थ- तुलसीदास जी कहते हैं कि विपत्ति में अर्थात मुश्किल वक्त में ये चीजें मनुष्य का साथ देती है. ज्ञान, विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, आपका सत्य और राम (भगवान) का नाम।

ज्ञान पर दोहे

तुलसी जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।

अर्थ- जो लोग दूसरों की निन्दा करके खुद सम्मान पाना चाहते हैं. ऐसे लोगों के मुँह पर ऐसी कालिख लग जाती है, जो लाखों बार धोने से भी नहीं हटती है.

बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि।
सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि।।

अर्थ- किसी की मीठी बातों और किसी के सुंदर कपड़ों से, किसी पुरुष या स्त्री के मन की भावना कैसी है यह नहीं जाना जा सकता है. क्योंकि मन से मैले सूर्पनखा, मारीच, पूतना और रावण के कपड़े बहुत सुन्दर थे।

तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि

अर्थ- किसी व्यक्ति के सुंदर कपड़े देखकर केवल मूर्ख व्यक्ति हीं नहीं बल्कि बुद्धिमान लोग भी धोखा खा जाते हैं . ठीक उसी प्रकार जैसे मोर के पंख और उसकी वाणी अमृत के जैसी लगती है, लेकिन उसका भोजन सांप होता है।

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।
काम वात कफ लोभ अपारा।क्रोध पित्त नित छाती जारा।

अर्थ- अज्ञान सभी रोगों की जड़ है। इससे बहुत प्रकार के कष्ट उत्पन्न होते हैं। काम वात और लोभ बढ़ा हुआ कफ है। क्रोध पित्त है जो हमेशा हृदय जलाता रहता है।

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि विलोकत पातक भारी।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरू समाना।

अर्थ- तुलसीदास जी कहते हैं – जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होता है उसे देखने से भी भारी पाप लगता है. अपने पहाड़ समान दुख को धूल के बराबर और मित्र के साधारण धूल समान दुख को सुमेरू पर्वत के समान समझना चाहिए

जिन्ह कें अति मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा । गुन प्रगटै अबगुनन्हि दुरावा।

अर्थ- जिनके स्वभाव में इस प्रकार की बुद्धि न हो वे मूर्ख केवल जिद करके हीं किसी से मित्रता करते हैं. सच्चा मित्र गलत रास्ते पर जाने से रोककर सही रास्ते पर चलाता है और अवगुण छिपाकर केवल गुणों को प्रकट करता है।

सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं।
माया कृत परमारथ नाहीं।

अर्थ- इस संसार में सभी शत्रु और मित्र तथा सुख और दुख, माया झूठे हैं और वस्तुतः वे सब बिलकुल नहीं हैं।

सुर नर मुनि सब कै यह रीती।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।

अर्थ- तुलसीदास जी कहते हैं – देवता, आदमी, मुनि – सबकी यही रीति है कि सब अपने स्वार्थपूर्ति हेतु हीं प्रेम करते हैं.

को न कुसंगति पाइ नसाई।
रहइ न नीच मतें चतुराई।

अर्थ- तुलसीदास जी कहते हैं – खराब संगति से सभी नष्ट हो जाते हैं. नीच लोगों के विचार के अनुसार चलने से चतुराई, बुद्धि भ्रष्ट हो जाती हैं .

काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।
वयरू अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों।

अर्थ- वे काम, क्रोध, अहंकार, लोभ के अधीन होते हैं। वे निर्दयी, छली, कपटी एवं पापों के भंडार होते हैं। वे बिना कारण सबसे दुशमनी रखते हैं। जो भलाई करता है वे उसके साथ भी बुराई ही करते हैं।

पर द्रोही पर दार पर धन पर अपवाद
तें नर पाॅवर पापमय देह धरें मनुजाद।

अर्थ- वे दुसरों के द्रोही परायी स्त्री और पराये धन तथा पर निंदा में लीन रहते हैं। वे पामर और पापयुक्त मनुष्य शरीर में राक्षस होते हैं।

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ज्ञान पर दोहे

या अनुरागी चित्त की, गति समुझे नहिं कोई।
ज्यौं-ज्यौं बूड़े स्याम रंग, त्यौं-त्यौ उज्जलु होइ।।

अर्थ- बिहारी जी कहते है कि इस प्रेमी मन की गति को कोई भी नहीं समझ सकता। क्योकि यह प्रेमी मन जैसे जैसे कृष्ण के रंग में रंगता जाता है। वैसे – वैसे यह उज्ज्वल या अधिक निर्मल हो जाता हैं।

मैं समुझयौ निरधार,यह जगु काँचो कांच सौ।
एकै रूपु अपर, प्रतिबिम्बित लखियतु जहाँ।।

अर्थ- बिहारी लाल जी कहते है कि इस सत्य को मैंने जान लिया है कि यह संसार निराधार है। यह काँच के समान कच्चा है अर्थात मिथ्या है। कृष्ण का सौन्दर्य अपार है जो सम्पूर्ण संसार मे प्रतिबिम्बित हो रहा है।

जिनके जीवन में दिपै ,ज्ञान ,कर्म अरु भक्ति ।
तिनके प्रभु रक्षक सदा ,मिले अपरमित शक्तित ।।

अर्थ- जिसके जीवन में सदा ज्ञान, कर्म और भक्ति रहती है, उस व्यक्ति की भगवान सदैव रक्षा करते हैं।

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