हैदर अली का जीवन परिचय Hyder Ali in Hindi

हैदर अली

हैदर अली का जीवन परिचय Hyder Ali in Hindi

हैदर अली का जीवन परिचय भारत के इतिहास में हैदर अली का उदय उस दीप्तिमान नक्षत्र की भाँति कुछ समय के लिए आकाश में जगमगा कर शून्य में विलीन हो गया ।

 हैदर अली का जन्म सन् 1721 ई 0 में मैसूर राज्य के सामान्य परिवार में हुआ था । हैदर अली के पिता का नाम फात मुहम्मद था।  उनके पिता मैसूर की सेना में सिपाही थे । हैदर अली ने भी मैसूर की सेना में नौकरी कर ली । बचपन में उनके पिता की मृत्यु हो गयी थी । इस कारण उनकी शिक्षा – दीक्षा का कोई उचित प्रबंध नहीं हो सका और परिवार के पालन – पोषण का भार भी उन्हीं के कंधों पर आ पड़ा ।

हैदर अली परिश्रमी और कुशाग्र बुद्धि के सैनिक थे और बड़ी तत्परता से अपने कर्तव्य का पालन करते थे । उनकी योग्यता देखकर गैसूर राज्य के मंत्री ने उन्हें देवनहाली के किले का रक्षक नियुक्त कर दिया । उस समय मराठे और निजाम मैसूर पर आक्रमण कर रहे थे । अवसर का लाभ उठाकर हैदर अली अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाने लगे । सन् 1755 ई 0 में वे डिण्डीगल के फौजदार बन गए और अपनी एक सेना तैयार कर ली ।

अंग्रेजों की रणनीति और उनके सैनिक प्रशिक्षण को वे श्रेष्ठ समझते थे । फ्रान्सीसियों की सहायत से उन्होंने अपनी सेना को भी आधुनिक ढंग से प्रशिक्षित किया । उन्होंने डिण्डीगल में आधुनिक ढंग क तोपखाना भी स्थापित कर लिया ।

हैदर अली का जीवन परिचय मुख्य बिंदु

पुरा नाम Full Name हैदर अली

जन्म तारीख Date of Birth 

जन्म स्थान Place of Birth बुडिकोट

मृत्यु Death  7 दिसंबर 1782, चित्तूर

राजवंश मैसूर साम्राज्य

पारिवारिक जानकारी Family Information

पिता का नाम Father’s Name फात मुहम्मद

माता का नाम Mother’s Name लाल बाई

पत्नी का नाम Spouse Name फातिमा फखर-उन-निसा

पुत्र का नाम टीपू सुल्तान

 जब मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया तब मैसूर की रक्षा के लिए हैदर अली अपनी सेना लेकर गए । उन्होंने बड़ी बहादुरी से युद्ध किया और शत्रुओं को राज्य की सीमा से बाहर खदेड़ दिया । युद्ध वजय प्राप्त करके उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे कुशल और योग्य सेना संचालक थे । अब राज्य में उन भाव बहुत बढ़ गया था । राज्य के मन्त्रियों को भी उन्होंने अपने प्रभाव में ले लिया था । राजा के स्वर्गव ने जाने पर वे स्वयं मैसूर के शासक बन गए ।

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 यद्यपि हैदर अली पढ़े लिखे नहीं थे पर वे कुशल प्रशासक थे । अपनी प्रजा को वे समान दृष्टि से| वे न्यायप्रिय थे और निर्णय लेने में कभी विलम्ब नहीं करते थे । हैदर अली स्वयं अनुशासन में रह र अनुशासन भंग करने वालों को कठोर दण्ड देते थे । किसानों के हित का वे ध्यान रखते थे न – दुखियों की सहायता करने के लिए सदा तैयार रहते थे । सेना के संगठन पर उनका विशेष ध्यान । उनके सैनिकों को नियत समय पर वेतन मिल जाता था और वे राज्य के सम्मान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बलि देने को तैयार रहते थे । हैदर अली के शासन

 हैदर अली की सफलता को देखकर मराठे और निजाम उनसे ईर्ष्या करने लगे थे और उनका नीच दिखाने की योजनाएँ बनाते रहते थे । हैदर अली ने मराठा राज्य के कुछ क्षेत्र को जीतकर अपने राज्य

 सन् 1765 ई ० में हैदर अली और निजाम ने मिलकर अंग्रेजों से युद्ध छेड़ दिया । अंग्रेजों ने निजाम तथा मैसूर की सम्मिलित सेना को पराजित कर दिया । पराजय से घबराकर निजाम ने अंग्रेजों से सन्धि कर ली । निजाम के इस व्यवहार से हैदर अली बहुत क्रोधित हुए । वे अकेले ही अंग्रेजों से लड़ते रहे । अंग्रेजों को पराजित करते हुए वे मद्रास ( चेन्नई ) के निकट जा पहुंचे । हैदर अली का रण कौशल देखकर अंग्रेज घबरा गए और उनके पास सन्धि का प्रस्ताव भेजा । हैदर अली ने अपमानजनक सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए अंग्रेजों को विवश कर दिया ।

इस युद्ध से दक्षिण भारत में हैदर अली का सिक्का जम गया । अब, हैदर अली समझ गए थे कि यदि एकजुट होकर अंग्रेजों का सशक्त विरोध न किया गया तो वे सारे सन् 1778 ई ० में अंग्रेजों और फ्रान्सीसियों में युद्ध छिड़ गया था । अंग्रेजों ने पाण्डिचेरी पर अधिकार था  ।

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 अंग्रेजों ने मालाबार तट पर स्थित माही नदी पर भी आक्रमण कर दिया । हैदर अली इसे सहन न कर सके उन्होंने निजाम और मराठों से मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध एक संघ बनाया और एक बड़ी सेना लेकर कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया । इस आक्रमण में हैदरअली ने अंग्रेज सेनापति कर्नल बेली का वध कर डाला और कर्नाटक की राजधानी पर अधिकार कर लिया । इस पराजय से अंग्रेजों की स्थिति बहुत बिगड़ गयी और ऐसा प्रतीत होने लगा कि अब दक्षिण भारत से अंग्रेजों के पैर उखड़ जायेगें ।

 हैदर अली को विश्वास था कि वे दक्षिण भारत में अंग्रेजों की शक्ति को समूल नष्ट कर देंगे, पर इसी समय अंग्रेज अपनी कूटनीति में सफल हो गए । उन्होंने मराठों के साथ सन्धि कर ली और हैदर को मराठी सहायता मिलनी बन्द हो गईं निजाम ने भी देखा कि अब हैदर अली का पक्ष कमजोर हो रहा है अतः उन्होंने भी अपना हाथ खींच लिया ।

हैदर अली अकेले ही अंग्रेजों से जूझते रहे । अन्तिम युद्ध शौलीगढ़ नामक स्थान पर हुआ जिसमें हैदरअली की हार हुई और उन्हें अंग्रेजों के साथ सन्धि करनी पड़ी । सन्धि के करार ने बाद ही हैदर अली बीमार पड़े और उनकी मृत्यु हो गईं निजाम और मराठों ने उनका डटकर साथ दिया इसीलिए वे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सके । एक सिपाही के पद से उन्नति करके हैदर अली एक राज्य के शासक बने थे । उनकी बुद्धि विलक्षणथी । अपनी बुद्धि के बल पर ही वे अपने जीवन में इतनी सफलता प्राप्त कर सके ।

बचपन में पिता की मृत्यु के साथ चलते हो जाने के कारण उनको अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था । वे परिश्रमी, दृढ़प्रतिज्ञ, कुशाग्रबुद्धि, दूरदर्शी और कुशल राजनीतिज्ञ थे । वे अवसर का लाभ उठाने में कभी नहीं चूकते थे । उनके सेना संचालन और रण कौशल की शत्रु भी प्रशंसा करते थे ।

 हैदर अली धर्मनिरपेक्ष शासक थे । हिन्दुओं और मुसलमानों में वे किसी प्रकार का भेद – भाव नहीं करते थे । उनके सिक्के पर एक ओर त्रिशूल लिए शिव और पार्वती की आकृतियाँ बनी थीं । महानवमी का पर्व वे विशेष उत्साह से मनाते थे । इस अवसर पर राजधानी को बन्दनवारों और पताकाओं से सजाया जाता था । दूर – दूर से साधु – महात्मा आते थे और अपने धर्म का उपदेश देते थे । दशहरे के दिन हाथी, ऊँट और घोड़ों के साथ सेना का शानदार जुलूस निकलता था ।

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हैदर अली सफेद हाथी पर सोने के हौदे में बैठकर जुलूस थे । भगवान राम की सवारी के पास पहुँचकर वे उनके दर्शन करते और आशीर्वाद प्राप्त करते थे । जुलूस भगवान की सवारी के पीछे हैदर का हाथी चलता था । जुलूस एक मैदान के निकट समाप्त होता था । मैदान में अनेक प्रकार के खेल की प्रतियोगिताएँ होती थीं । हिन्दू – मुसलमान सभी इन प्रतियोगिताओं में सम्मिलित होते थे । हैदर अली विजेताओं को पुरस्कार देते थे । उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता का जो आदर्श प्रस्तुत किया वह प्रशंसनीय और आज भी अनुकरणीय है ।

 हैदर अली के व्यवहार में किसी प्रकार का छल – कपट नहीं था । वे जो कुछ कहते थे वही करते थे । उन्होंने अपने शत्रुओं को भी कभी धोखा नहीं दिया । यदि मराठे और निजाम अंत तक उनका साथ देते तो आज भारत का इतिहास कुछ और ही होता ।

हैदर अली की मृत्यु

हैदर अली अकेले ही अंग्रेजों से जूझते रहे । अन्तिम युद्ध शौलीगढ़ नामक स्थान पर हुआ जिसमें हैदरअली की हार हुई और उन्हें अंग्रेजों के साथ सन्धि करनी पड़ी । सन्धि के करार ने बाद ही हैदर अली बीमार पड़े और उनकी मृत्यु हो गईं
हैदर अली कहां का शासक था ?

हैदर अली मैसूर का शासक था।

हैदर अली और टीपू सुल्तान कहा के शासक कौन थे ?

हैदर अली और टीपू सुल्तान मैसूर का शासक था।

हैदर अली का पुत्र कौन था ?

हैदर अली का पुत्र टीपू सुल्तान था।

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