कबीर के दोहे

कबीर के दोहे

कबीर के दोहे

 

नाम  Name कबीर

पुरा नाम Full Name कबीर साहेब जी

जन्म तारीख Date of Birth 1398 में

जन्म स्थान Place of Birth काशी

मृत्यु Death 1468 मगहर में उत्तर प्रदेश,

नागरिकता Nationality भारतीय

Home Town काशी

पारिवारिक जानकारी Family Information –

पिता का नाम Father’s Name ज्ञात नहीं

नीरू (पालन पोषण )

माँ का नाम Mother’s Name ज्ञात नहीं

नीमा (पालन पोषण )

गुरु का नाम रामानंद

अन्य जानकारी Other Information

कबीर दास जी का जन्म 1398 या 1440 से माना जाता है इनका जन्म वाराणसी में हुआ था। इनके  गुरु का नाम रामानंद था इनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था  जोकि लोक लाज के भय से इनको लहरतारा तालाब के समीप छोड़ आई थी नीरू  बीमा नामक दुल्हन इनका पालन पोषण किया ईश्वर की एकता पर बल दिया यह मूर्ति पूजा के विरोधी थे कबीरदास जी हिंदू और मुस्लिम में भेदभाव नहीं करते थे।  यह दोनों को एक ही मिट्टी के दो बदले मानते थे कबीर   की मृत्यु 1468 या 1510 ईस्वी में हुई। कबीर दास जी के अनुयाई कबीरपंथी के नाम से जाने जाते हैं

Sant Kabir Ke Dohe in hindi – प्रसिद्ध कबीर दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित

 

चिंता ऐसी डाकिनी, काटि करेजा खाए
वैद्य बिचारा क्या करे, कहां तक दवा खवाय॥
अर्थात चिंता ऐसी डाकिनी है, जो कलेजे को भी काट कर खा जाती है। इसका इलाज वैद्य नहीं कर सकता। वह कितनी दवा लगाएगा। वे कहते हैं कि मन के चिंताग्रस्त होने की स्थिति कुछ ऐसी ही होती है, जैसे समुद्र के भीतर आग लगी हो। इसमें से न धुआं निकलती है और न वह किसी को दिखाई देती है। इस आग को वही पहचान सकता है, जो खुद इस से हो कर गुजरा हो।

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गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥

 

अर्थात: कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं कि यदि गुरु और भगवान हमारे सामने एक साथ खड़े हों, तो आप किसके चरण स्पर्श करेंगे? गुरु ने हमें अपने ज्ञान के साथ भगवान से मिलने का रास्ता दिखाया है, इसलिए गुरु की महिमा भगवान के ऊपर है और हमें गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए।

 

आगि जो लगी समुद्र में, धुआं न प्रगट होए।
की जाने जो जरि मुवा, जाकी लाई होय।।

अर्थात:फिर इससे बचने का उपाय क्या है? मन को चिंता रहित कैसे किया जाए? कबीर कहते हैं, सुमिरन करो यानी ईश्वर के बारे में सोचो और अपने बारे में सोचना छोड़ दो। या खुद नहीं कर सकते तो उसे गुरु के जिम्मे छोड़ दो। तुम्हारे हित-अहित की चिंता गुरु कर लेंगे। तुम बस चिंता मुक्त हो कर ईश्वर का स्मरण करो। और जब तुम ऐसा करोगे, तो तुरत महसूस करोगे कि सारे कष्ट दूर हो गए हैं।

करु बहियां बल आपनी, छोड़ बिरानी आस।
जाके आंगन नदिया बहै, सो कस मरै पियास।।

अर्थात मनुष्य को अपने आप ही मुक्ति के रास्ते पर चलना चाहिए। कर्म कांड और पुरोहितों के चक्कर में न पड़ो। तुम्हारे मन के आंगन में ही आनंद की नदी बह रही है, तुम प्यास से क्यों मर रहे हो? इसलिए कि कोई पंडित आ कर बताए कि यहां से जल पी कर प्यास बुझा लो। इसकी जरूरत नहीं है। तुम कोशिश करो तो खुद ही इस नदी को पहचान लोगे।

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये ।

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ।

अर्थात इंसान को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को बहुत अच्छी लगे। ऐसी भाषा दूसरे लोगों को तो सुख पहुँचाती ही है, इसके साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

 अर्थात ज्यादा बोलना अच्छा नहीं होता सुखी और स्वस्थ रहना है तो अतियों से बचो। किसी चीज की अधिकता ठीक नहीं होती।

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर ।

पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर । ।

अर्थात खजूर का पेड़ बेशक बहुत बड़ा होता है लेकिन न तो यह किसी को छाया देता है और फल भी बहुत ऊंचाई पर दिखाई देता है। इसी तरह, अगर आप किसी का भला नहीं कर पा रहे हैं, तो ऐसे बड़े होने से कोई फायदा नहीं है।

 

कबिरा यह मन लालची, समझै नहीं गंवार।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार।।
कबिरा मन ही गयंद है, आंकुष दे दे राखु ।
विष की बेली परिहरी, अमरित का फल चाखु ।।

अर्थात यह मन लोभी और मूर्ख हैै। यह तो अपना ही हित-अहित नहीं समझ पाता। इसलिए इस मन को विचार रूपी अंकुश से वश में रखो, ताकि यह विष की बेल में लिपट जाने के बदले अमृत फल को खाना सीखे।

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे।। 

अर्थात जब कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को रौंद रहा था, तो मिट्टी कुम्हार से कहती है – तुम मुझे रौंद रहे हो, एक दिन आएगा जब तुम इस मिट्टी में घुल जाओगे और मैं तुम्हें रौंद दूंगा।

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय।
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय। । 

अर्थात कभी भी एक छोटे से तिनके की भी निंदा न करें जो आपके पैरों के नीचे दब जाता है। दर्द क्या होता है अगर वह धब्बा आँख में चला जाए!

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।
जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय।।

अर्थात मैं अपना पूरा जीवन दूसरों की बुराइयों को देखने में बिता रहा हूं, लेकिन जब मैंने अपने दिमाग में देखा, तो मैंने पाया कि मेरे लिए इससे बुरा कोई नहीं है। मैं सबसे ज्यादा स्वार्थी और दुष्ट हूं। हम दूसरों की बुराइयों को बहुत देखते हैं, लेकिन अगर आप अपने अंदर देखें, तो आप पाएंगे कि हमसे बुरा कोई व्यक्ति नहीं है।

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।।

अर्थात  हमारे पास बहुत कम समय है, वह काम करें जो आपको कल करना है, और वह करें जो आप आज करना चाहते हैं, क्योंकि तबाही एक पल में होगी, आप अपना काम कब करेंगे

जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप ।
जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप।।

अर्थात जहाँ दया है, वहाँ धर्म है और जहाँ लालच है वहाँ पाप है, और जहाँ क्रोध है वहाँ सर्वनाश है और जहाँ क्षमा है वहाँ ईश्वर का वास है।

जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश ।
जो है जा को भावना सो ताहि के पास।।

अर्थात कमल पानी में खिलता है और चंद्रमा आकाश में रहता है। लेकिन जब चंद्रमा की छवि पानी में चमकती है, तो कबीर दास जी कहते हैं कि कमल और चंद्रमा के बीच की दूरी के बावजूद, दोनों कितने करीब हैं। पानी में चंद्रमा का परावर्तन ऐसा लगता है मानो चंद्रमा स्वयं कमल पर आ गया है। इसी तरह, जब कोई व्यक्ति भगवान से प्यार करता है, तो वह भगवान खुद उसके पास आता है।

जाती न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।। 

अर्थात ऋषि से उनकी जाति के बारे में न पूछें, बल्कि उनसे ज्ञान के बारे में बात करें, उनसे ज्ञान की तलाश करें। यदि आप खरीदना चाहते हैं, तो तलवार करें, स्कैबार्ड को झूठ बोलने दें

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर। 

ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।।

अर्थात किसी के साथ कोई अत्यधिक मित्रता नहीं होनी चाहिए, न ही अत्यधिक घृणा।

माया मरी न मन मरा, मर मर गये शरीर।

आषा तृष्णा ना मरी, कह गये दास कबीर।।

अर्थात शरीर, मन, भ्रम सभी नष्ट हो जाते हैं, लेकिन मन में उत्पन्न होने वाली आशा और लालसा कभी नष्ट नहीं होती है।

सांई ते सब होत है, बन्दे से कुछ नाहिं।

राई से पर्वत करे, पर्वत राई माँहि।।

अर्थात ईश्वर सर्वशक्तिमान है, वह कुछ भी करने में सक्षम है लेकिन आदमी कुछ नहीं कर सकता।

मल मल धोए शरीर को, धोए न मन का मैल ।

नहाए गंगा गोमती, रहे बैल के बैल ।।

अर्थात कोई व्यक्ति अपने मन का मेल साफ़ नहीं करता तब तक वो कभी एक सज्जन नहीं बन सकता फिर चाहे वो कितना ही गंगा और गोमती जैसे पवित्र नदी में नाहा ले वो मुर्ख के मुर्ख ही रहेगा।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। 

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।

इस दुनिया में न जाने कितने लोग आये और मोटी मोटी किताबे पढ़ कर चले गए पर कोई भी सच्चा ज्ञानी नहीं बन सका सच्चा ज्ञानी वही है, जो प्रेम का ढाई अक्छर पढ़ा हो

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय ।
जो सुख मे सुमीरन करे, तो दुःख काहे को होय ।।

अगर हम अच्छे समय में, यानी अच्छे समय में सुख मे सुमीरन करने  रहने लगेंगे, तो दुःख कभी नहीं आएगा।

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